नई दिल्ली बांग्लादेश की अंतरिम सरकार द्वारा निर्वासित प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग ने भारत को एक कठिन राजनयिक स्थिति में डाल दिया है। भारत और बांग्लादेश के बीच कैदियों के प्रत्यर्पण संधि का हवाला देकर यह मांग की गई है, जिससे भारत के लिए निर्णय लेना और भी चुनौतीपूर्ण हो गया है।
भारत-बांग्लादेश संबंधों पर प्रभाव:अंतरिम सरकार की मांग को ठुकराने से भारत और बांग्लादेश के कूटनीतिक संबंधों में तनाव बढ़ सकता है।वर्तमान समय में, बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता के दौर में भारत ऐसा कदम नहीं उठाना चाहेगा, जिससे तनाव और बढ़े।
अंतरराष्ट्रीय संधियों की आस्था पर प्रश्न:प्रत्यर्पण को अस्वीकार करने पर भारत की अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौतों के प्रति प्रतिबद्धता पर सवाल उठ सकते हैं।भारत के भगोड़े नागरिकों (जैसे जाकिर नायक, ललित मोदी और नीरव मोदी) की वापसी के लिए चल रही मुहिम पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
मध्यमार्ग अपनाने की संभावना:भारत, प्रत्यर्पण की मांग को न स्वीकारते हुए, शेख हसीना की स्थिति पर तटस्थता बनाए रख सकता है। यह कदम अंतरिम सरकार को सीधे नाराज किए बिना संतुलन बनाए रखने में मदद कर सकता है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर विचार-विमर्श:भारत, इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाकर, तटस्थ समीकरण की स्थिति पैदा कर सकता है। इससे उसकी प्रतिबद्धता पर सवाल नहीं उठेंगे और संबंधों में तनाव कम होगा।
फिलहाल भारत ने इस मामले में चुप्पी साध रखी है। यह निर्णय भारत को सही समय पर ठोस और संतुलित कदम उठाने का मौका देता है।