



अनुराग ने कहा कि भारत में Gen-Z को एक ही श्रेणी में रखकर समझना बेहद मुश्किल है, क्योंकि हर राज्य का अपना अलग वर्गीय, सामाजिक और जातिगत दृष्टिकोण है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दिल्ली का कोई Gen-Z टेलर स्विफ्ट के कॉन्सर्ट में जाने के लिए उत्साहित हो सकता है, वहीं राजस्थान का कोई Gen-Z सपना चौधरी के कॉन्सर्ट में जाने को लेकर उतना ही बेताब हो सकता है। इसी तरह मुंबई का कोई युवा जोहरान ममदानी का प्रशंसक हो सकता है, तो राजस्थान में कोई Gen-Z अशोक गहलोत से प्रेरित नजर आ सकता है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि इतनी भिन्न आकांक्षाओं और रुचियों को एक साथ कैसे जोड़ा जाए।
अनुराग ने कहा कि यही वजह है कि Gen-Z को एक समान सोच वाली पीढ़ी मानकर यह विश्लेषण करना कठिन हो गया है कि क्या वह किसी एक बड़ी राष्ट्रीय क्रांति का नेतृत्व कर सकती है या नहीं। हर राज्य की सामाजिक संरचना अलग है, इसलिए Gen-Z की प्रतिक्रियाएं और आंदोलन भी क्षेत्रीय स्तर पर अलग-अलग रूप लेते हैं।
उन्होंने आगे कहा कि इसका मतलब यह नहीं है कि Gen-Z बदलाव नहीं ला रही। उदाहरण के तौर पर राजस्थान और बिहार में पेपर लीक के मामलों को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन देखें, जहां Gen-Z ने नेतृत्व किया और व्यवस्था के खिलाफ मजबूती से आवाज उठाई। कहीं भी पेपर लीक की घटना सामने आती है तो उस पर युवाओं का संगठित विरोध भी Gen-Z की ही क्रांति है। फर्क सिर्फ इतना है कि ये आंदोलन अक्सर स्थानीय या राज्य स्तर पर सीमित रह जाते हैं और उतने आकर्षक या प्रभावशाली तरीके से सामने नहीं आ पाते कि उन्हें राष्ट्रीय स्तर की बड़ी क्रांति के रूप में देखा जाए।