



जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) में जनरेशन Z और मिलेनियल्स की सोच, संघर्ष और सामाजिक भूमिका पर चर्चा करते हुए वक्ता रिया चोपड़ा ने कहा कि जिसे आज “जनरेशन Z की क्रांति” कहा जा रहा है, वह किसी एक घटना या मुद्दे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन प्रणालियों के खिलाफ एक व्यापक पीढ़ीगत आंदोलन है, जो अब युवाओं के लिए काम नहीं कर रही हैं। उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत रूप से उन्हें यह क्रांति पसंद है, क्योंकि यह उस सामूहिक एहसास से जन्म लेती है कि मौजूदा व्यवस्थाएं युवाओं की समस्याओं का समाधान नहीं कर पा रही हैं।
रिया चोपड़ा ने कहा कि उनकी पीढ़ी, खासकर मिलेनियल्स, लगातार “परमाक्राइसिस” यानी स्थायी संकट की स्थिति में जी रही है। इसका अर्थ है कि दुनिया एक के बाद एक संकट युवाओं पर थोप रही है—चाहे वह स्वास्थ्य प्रणाली की विफलता हो, राजनीतिक व्यवस्था की कमजोरी हो या फिर जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर चुनौती। उन्होंने कहा कि इन तमाम संकटों के बावजूद ऐसा लगता है कि कोई भी प्रभावी रूप से कुछ नहीं कर रहा है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दिल्ली जैसे शहरों में प्रदूषण एक गंभीर समस्या है, जिसे हर कोई अपनी आंखों से देख सकता है, लेकिन इसके समाधान की दिशा में ठोस कार्रवाई नजर नहीं आती। ऐसे माहौल में युवाओं को यह एहसास होता है कि अगर व्यवस्थाएं उनके लिए काम नहीं कर रही हैं, तो उन्हें खुद आगे आकर कुछ करना होगा। यही भावना युवाओं को एकजुट करती है और उन्हें उस दुनिया के खिलाफ खड़ा करती है, जो उनके भविष्य के प्रति उदासीन दिखाई देती है।
रिया चोपड़ा के अनुसार, जनरेशन Z के आंदोलनों की भाषा और शब्दावली भी उनकी पीढ़ी की सोच को दर्शाती है। यह केवल विरोध नहीं है, बल्कि एक साझा चेतना है, जिसमें युवा अपने अनुभवों, असंतोष और उम्मीदों को नए तरीके से अभिव्यक्त कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यही सामूहिक भावना और साझा संघर्ष इन क्रांतियों को गति देता है और आने वाले समय में सामाजिक बदलाव की दिशा तय करेगा।