



जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) के चारबाग में आयोजित ‘Gen Z, मिलेनियल्स और मम्मीजी’ सत्र में भारतीय समाज की सोच, डिजिटल संस्कृति और राजनीति की बदलती भूमिका पर गहन विमर्श हुआ। इस सत्र में संतोष देसाई ने कहा कि उनके अनुसार भारत आज दुनिया की महाशक्तियों में से एक है, लेकिन साथ ही उसमें परिवर्तन का विरोध करने की भी अद्भुत क्षमता है। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज ने खुद को इस तरह गढ़ लिया है कि वह प्रगति और विकास की बात तो करता है, लेकिन मूल रूप से परिवर्तन को स्वीकार करने से हिचकता है।
संतोष देसाई ने इसे आज के भारत का एक केंद्रीय मुद्दा बताते हुए कहा कि हम विकास की आवाजें सुनना चाहते हैं, तेज़ प्रगति चाहते हैं, लेकिन जब वास्तविक बदलाव की बात आती है, तो समाज उसका विरोध करने लगता है। उनके अनुसार यही विरोधाभास भारतीय समाज की सबसे बड़ी चुनौती है। उन्होंने डिजिटल संस्कृति का उदाहरण देते हुए कहा कि व्यक्तिगत स्तर पर डिजिटल तकनीक बेहद परिवर्तनकारी साबित हुई है। लोगों के सोचने, बोलने और जुड़ने के तरीके बदल गए हैं, हालांकि इसके विपरीत कुछ छोटे-मोटे आंदोलन और अपवाद भी देखने को मिलते हैं।
उन्होंने राजनीति की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए कहा कि राजनीति का मूल उद्देश्य समाज को बदलना था, लेकिन समय के साथ समाज ने ही राजनीति को बदल दिया है। आज वे संस्थाएं, जिनका उद्देश्य समाज में परिवर्तन लाना था, खुद राजनीति से प्रभावित हो चुकी हैं। उन्होंने न्यायपालिका (ज्यूडिशरी) का उदाहरण देते हुए कहा कि यह भी इस व्यापक प्रभाव से अछूती नहीं है।
इस सत्र में अनुराग माइनस वर्मा, संतोष देसाई और रिया चोपड़ा ने चिराग ठक्कर के साथ संवाद किया। चर्चा के दौरान जनरेशन Z, मिलेनियल्स और पारंपरिक सोच के बीच के टकराव, डिजिटल युग के प्रभाव और भारतीय समाज के भीतर मौजूद बदलाव व विरोधाभासों को लेकर कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर रोशनी डाली गई।