



जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के तीसरे दिन आयोजित ‘गांधी–सावरकर और जिन्ना’ विषयक सत्र में लेखक और विचारक मार्कण्ड आर. परांजपे ने तीनों ऐतिहासिक व्यक्तित्वों की विचारधाराओं, मतभेदों और आपसी संबंधों पर विस्तार से चर्चा की। परांजपे ने कहा कि भले ही सावरकर और महात्मा गांधी के बीच गहरे वैचारिक मतभेद रहे हों, लेकिन एक बिंदु पर दोनों की सहमति थी और वह था ‘स्वराज’। उन्होंने कहा कि आज की राजनीति में इन विचारों को केवल सरल रेखाओं में बांटकर देखना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा।
दर्शकों के एक सवाल पर कि आज के दौर में गांधी, जिन्ना या सावरकर में से किसकी विचारधारा समाज को एक कर सकती है, परांजपे ने कहा कि गांधी के योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता। उन्होंने कहा कि यदि एकता की बात करें तो शांति का रास्ता चुनने वाला व्यक्ति समाज को जोड़ सकता है, लेकिन आज के समय में केवल आदर्शों से नहीं, बल्कि खतरों और चुनौतियों का सामना करने की क्षमता भी जरूरी है।
परांजपे ने सावरकर और आरएसएस के संबंधों को “दिलचस्प” बताते हुए कहा कि डॉ. हेडगेवार और सावरकर मित्र थे, लेकिन सावरकर चाहते थे कि आरएसएस सीधे राजनीति में उतरे। इसी मुद्दे पर सावरकर ने आरएसएस की आलोचना भी की थी, हालांकि आरएसएस ने कभी सावरकर की आलोचना नहीं की। उन्होंने कहा कि यह उस दौर की राजनीति की जटिलता को दर्शाता है।
खिलाफत आंदोलन का उल्लेख करते हुए परांजपे ने कहा कि यह आंदोलन खलीफा के पद को बहाल करने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। गांधी ने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए इसका समर्थन किया, जबकि सावरकर ने इसका विरोध किया। उन्होंने एक प्रसंग साझा करते हुए बताया कि जब सावरकर रत्नागिरी में हाउस अरेस्ट में थे, तब गांधी उनसे मिलने गए थे। उस दौरान सावरकर ने गांधी को चेताया था कि मुस्लिमों की तुष्टिकरण की नीति भविष्य में भारत के विभाजन का कारण बन सकती है।
परांजपे ने कहा कि उस दौर की राजनीति को केवल सेकुलर बनाम धार्मिक के नजरिये से समझना आसान नहीं है। उन्होंने बताया कि जिन्ना को उस समय सेकुलर माना जाता था, जबकि गांधी स्वयं को सनातनी हिंदू कहते थे, लेकिन फिर भी हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे। वहीं, सावरकर नास्तिक थे। जिन्ना गांधी को अव्यावहारिक मानते थे और उनके तरीकों की आलोचना करते थे, जबकि सावरकर ने गांधी की प्रशंसा करते हुए मराठी में लिखा था कि गांधीवादियों का प्रभाव समाज पर बहुत गहरा है।
परांजपे ने कहा कि सावरकर ने उन खतरों को पहले ही भांप लिया था, जो भारत को पड़ोसी देशों से भविष्य में झेलने पड़ सकते थे, लेकिन उस समय कांग्रेस के नेता इन खतरों को नहीं समझ पाए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हिंदू महासभा की स्थापना मदन मोहन मालवीय और लाल लाजपत राय जैसे कांग्रेस नेताओं द्वारा की गई थी, न कि आज की परिभाषा में बताए जाने वाले तथाकथित हिंदुत्ववादियों द्वारा, हालांकि सावरकर ने उस संगठन को एक नई दिशा और विस्तार दिया।