



जयपुर। राज्य सरकार को 2.74 अरब रुपये की राजस्व हानि पहुंचाने के गंभीर प्रकरण में तत्कालीन खनिज अभियंता अनिल खिमेसरा को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है। यह कार्रवाई राज्यपाल के आदेश से की गई, जिस पर राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) ने भी सहमति प्रदान की। मामला सीकर जिले के दो खनन पट्टों से जुड़ा है, जहां बिना रवन्ना खनिज निर्गमन कराए जाने से राज्य सरकार को भारी वित्तीय नुकसान हुआ।
सरकारी जांच में सामने आया कि वर्ष 2010 से 2013 के बीच पदस्थापन अवधि के दौरान अनिल खिमेसरा द्वारा लगातार लापरवाही बरती गई। आरोप है कि बिना रवन्ना खनिज निकासी होने के बावजूद न तो समय पर मांग निर्धारण किया गया और न ही संबंधित खनन पट्टों का खंडन (कैंसिलेशन) किया गया। जांच रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट हुआ कि नोटिस जारी होने के बावजूद आवश्यक वैधानिक कार्रवाई नहीं की गई, जिससे अवैध खनन को अप्रत्यक्ष रूप से संरक्षण मिला और राजस्व को भारी क्षति हुई।
प्रकरण में विभागीय कार्रवाई के बाद राज्य सरकार ने बर्खास्तगी का प्रस्ताव RPSC को भेजा, जिस पर आयोग ने सहमति दी। इसके पश्चात राज्यपाल के आदेश से अनिल खिमेसरा को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। प्रशासनिक हलकों में इस निर्णय को खनन विभाग में अनुशासन और जवाबदेही स्थापित करने की दिशा में एक कड़ा कदम माना जा रहा है।
हालांकि, इस कार्रवाई के बाद एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया है। विभाग के भीतर चर्चा है कि समान आरोपों और यहां तक कि लोकायुक्त से दंडित मामलों के बावजूद कुछ अन्य अधिकारी अब भी पदों पर बने हुए हैं। ऐसे में खिमेसरा प्रकरण को कई लोग समान न्याय के अभाव के रूप में देख रहे हैं।
प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में यह सवाल गूंज रहा है कि क्या खनन विभाग में समान आरोपों का सामना कर रहे अन्य अधिकारियों पर भी इसी तरह सख्त कार्रवाई की जाएगी, या यह मामला केवल चयनात्मक कार्रवाई तक सीमित रह जाएगा। आने वाले समय में सरकार का रुख इस बात को स्पष्ट करेगा कि क्या विभाग में सभी दोषियों पर समान रूप से कानून का शिकंजा कसा जाएगा।