



सीकर। अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री एवं दंडी स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने सीकर प्रवास के दौरान देश के सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मुद्दों पर अपनी राय रखी। उन्होंने दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान नेताओं के खिलाफ कथित अभद्र भाषा के इस्तेमाल की आलोचना की। साथ ही नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को मनुस्मृति और अंबेडकरवाद के मुद्दे पर खुले मंच से तुलनात्मक विमर्श की चुनौती दी।
स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि जंतर-मंतर पर शीर्ष नेताओं के लिए कथित तौर पर आपत्तिजनक और अभद्र शब्दों का इस्तेमाल करने वाले लोगों को देश की पूरी युवा पीढ़ी या ‘जेन-जी’ का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता।
उन्होंने युवाओं की धार्मिक यात्राओं का उदाहरण देते हुए कहा कि बड़ी संख्या में युवा भगवान राम और कृष्ण के प्रति आस्था रखते हैं तथा कांवड़ यात्रा जैसे धार्मिक आयोजनों में भाग लेते हैं। उनके मुताबिक भारतीय युवा पीढ़ी की पहचान कुछ लोगों के विवादित आचरण के आधार पर तय नहीं की जानी चाहिए।
स्वामी जितेंद्रानंद ने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी असहमति जताई। उन्होंने न्यायपालिका और उसके कुछ निर्णयों को लेकर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी समाज के संचालन में कानून के साथ नैतिक और सामाजिक मूल्यों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
उन्होंने कहा कि परिवार और समाज केवल कानूनी प्रावधानों से संचालित नहीं होते, बल्कि सामाजिक और नैतिक मान्यताओं की भी इसमें भूमिका रहती है।
हालांकि, कानूनी स्थिति यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सहमति से वयस्कों के बीच समलैंगिक संबंधों को अपराध मानने वाली IPC की धारा 377 के संबंधित हिस्से को असंवैधानिक घोषित किया था। स्वामी जितेंद्रानंद की टिप्पणियां इस न्यायिक व्यवस्था पर उनके व्यक्तिगत विचार और असहमति के रूप में देखी जानी चाहिए।
मनुस्मृति, मनुवाद और अंबेडकरवाद को लेकर चलने वाली राजनीतिक बहस पर भी स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को चुनौती दी।
उन्होंने कहा कि इस विषय को केवल राजनीतिक नारों के आधार पर देखने के बजाय विभिन्न धार्मिक ग्रंथों और ऐतिहासिक स्रोतों का तुलनात्मक अध्ययन और सार्वजनिक विमर्श होना चाहिए।
स्वामी जितेंद्रानंद ने दावा किया कि 1794 में विलियम जोन्स द्वारा प्रकाशित मनुस्मृति के संस्करण को वास्तविक मनुस्मृति का निर्विवाद स्वरूप नहीं माना जा सकता। उन्होंने राहुल गांधी को खुले मंच पर इस विषय में सभी धर्मों के ग्रंथों को सामने रखकर तुलनात्मक चर्चा करने की चुनौती दी।
सीकर प्रवास के दौरान बातचीत में स्वामी जितेंद्रानंद ने कहा कि देश में सामाजिक और धार्मिक विषयों पर चर्चा तथ्य, परंपरा और ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर होनी चाहिए। उन्होंने युवाओं को लेकर बनाई जाने वाली सामान्य धारणाओं पर भी आपत्ति जताई और कहा कि कुछ घटनाओं के आधार पर पूरी पीढ़ी के चरित्र का आकलन नहीं किया जाना चाहिए।