



मनोहर चावला ने विस्थापित परिवारों की पीड़ा और संघर्ष को किया साझा, बोले—सब कुछ गंवाकर आए परिवारों की पीढ़ियां आज भी कई सवालों के जवाब का कर रही हैं इंतजार
बीकानेर। विभाजन विभीषिका दिवस के अवसर पर देश के बंटवारे के दौरान विस्थापन, हिंसा और अपनों को खोने की पीड़ा को याद करते हुए बीकानेर में पंजाबी और सिंधी समाज के लोगों ने मौन शांति मार्च निकाला। पब्लिक पार्क से गांधी पार्क तक निकाले गए इस मार्च में भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता भी शामिल हुए। इस दौरान वर्ष 1947 के विभाजन में जान गंवाने वाले लोगों को भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
विभाजन पीड़ित परिवार से जुड़े मनोहर चावला ने इस अवसर पर अपने परिवार और लाखों विस्थापितों के संघर्ष को साझा करते हुए कहा कि 14 अगस्त का दिन उन परिवारों की पीड़ा को याद करने का अवसर है, जिन्हें विभाजन के समय अपना घर, जमीन, कारोबार और वर्षों से बनाई गई संपत्ति छोड़कर पलायन करना पड़ा था।
उन्होंने कहा कि विभाजन केवल भूगोल का बंटवारा नहीं था, बल्कि लाखों परिवारों के जीवन को हमेशा के लिए बदल देने वाली त्रासदी थी। बड़ी संख्या में परिवार उजड़ गए, लोगों ने अपने परिजनों को खोया और पीढ़ियों की मेहनत से अर्जित आवासीय, कृषि तथा व्यावसायिक संपत्तियां पीछे छूट गईं।
मनोहर चावला ने कहा कि भारत पहुंचने के बाद भी विस्थापित परिवारों के सामने संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। उन्हें सीमित संसाधनों के बीच अपना जीवन दोबारा खड़ा करना पड़ा। कई परिवारों को रहने के लिए आवंटित मकानों के लिए ऋण लेना पड़ा और उसकी अदायगी भी करनी पड़ी।
उन्होंने कहा कि तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों में विस्थापित लोगों को ‘शरणार्थी’ जैसे संबोधनों और कई तरह के तानों का भी सामना करना पड़ा। इसके बावजूद इन परिवारों ने हार नहीं मानी। कठिन परिश्रम और सीमित साधनों के बीच अपने बच्चों को शिक्षित किया और धीरे-धीरे नौकरी, व्यापार तथा दूसरे क्षेत्रों में अपनी जगह बनाई।
चावला ने सवाल उठाया कि विभाजन के दौरान पीछे छूटी संपत्तियों और परिवारों को हुए भारी आर्थिक नुकसान की भरपाई किस हद तक हुई। उन्होंने कहा कि उनके जैसे अनेक परिवारों की अगली पीढ़ियों के मन में आज भी यह सवाल है कि उनके पूर्वजों का आखिर क्या कसूर था कि एक तरफ उन्हें अपना सब कुछ छोड़कर पलायन करना पड़ा और दूसरी तरफ नए स्थान पर जीवन शून्य से शुरू करना पड़ा।
उन्होंने कहा कि विभाजन विभीषिका दिवस मनाते समय उन परिवारों के आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक संघर्ष को भी याद किया जाना चाहिए, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने जीवन को दोबारा खड़ा किया।
विभाजन विभीषिका दिवस पर बीकानेर में पब्लिक पार्क से गांधी पार्क तक पंजाबी और सिंधी समाज के लोगों तथा भाजपा कार्यकर्ताओं ने मौन शांति मार्च निकाला। गांधी पार्क पहुंचकर विभाजन के दौरान जान गंवाने वाले लोगों को श्रद्धांजलि दी गई।
राष्ट्रीय पंजाबी महासभा के प्रदेश सचिव प्रेमप्रकाश खत्री ने अपने संबोधन में वर्ष 1947 की विभाजन त्रासदी को विश्व इतिहास के सबसे भयावह दौर में से एक बताया। उन्होंने कहा कि विभाजन के कारण करोड़ों लोगों को विस्थापन और कठिनाइयों का सामना करना पड़ा तथा बड़ी संख्या में लोगों ने अपनी जान गंवाई।
उन्होंने कहा कि पंजाबी और सिंधी समाज के परिवार अपना घर-बार और संपत्ति छोड़कर भारत आए, लेकिन कठिन परिस्थितियों के सामने झुके नहीं। उन्होंने नए स्थानों पर शून्य से जीवन की शुरुआत की और अपनी मेहनत के बल पर खुद को स्थापित किया।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि जब देश स्वतंत्रता का उत्सव मनाने की तैयारी कर रहा था, उसी समय लाखों परिवार अपना सब कुछ पीछे छोड़कर अनजान भविष्य की ओर बढ़ रहे थे। इन परिवारों ने असहनीय पीड़ा के बावजूद हार नहीं मानी और आने वाली पीढ़ियों के लिए नए जीवन की नींव रखी।
विभाजन के दौरान मारे गए लोगों और विस्थापन की पीड़ा झेलने वाले परिवारों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा गया—उन महान पूर्वजों को शत-शत नमन, जिन्होंने अपना सब कुछ गंवाने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी और नई दुनिया को नए सिरे से बनाया।