



41 जिला परिषदों में ओबीसी को सिर्फ 5 जिला प्रमुख पद, एससी-एसटी आरक्षण बढ़ा, नेताओं ने उठाए सवाल—लॉटरी का फॉर्मूला और 50% सीलिंग बनी बहस का केंद्र
जयपुर। ओबीसी आयोग की रिपोर्ट के आधार पर निकाली गई निकाय और जिला प्रमुख पदों की आरक्षण लॉटरी अब राजनीतिक विवाद में घिर गई है। कांग्रेस और ओबीसी वर्ग के कई नेताओं ने आरोप लगाया है कि आबादी बढ़ने के बावजूद ओबीसी वर्ग को अपेक्षित राजनीतिक आरक्षण नहीं मिला। वहीं कुछ नेताओं ने आंदोलन की चेतावनी भी दी है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस बार वास्तव में ओबीसी आरक्षण पिछली बार की तुलना में कम हुआ है। जिला प्रमुख पदों के आंकड़े देखें तो इस बार ओबीसी आरक्षण प्रतिशत में कमी आई है।
पिछले चुनाव में राजस्थान में 33 जिला परिषदें थीं और इनमें से 5 जिला प्रमुख पद ओबीसी के लिए आरक्षित थे। उस समय यह अनुपात करीब 15.15 प्रतिशत था।
अब जिला परिषदों की संख्या बढ़कर 41 हो गई है, लेकिन ओबीसी के लिए जिला प्रमुख पदों की संख्या अभी भी 5 ही है। इस कारण ओबीसी आरक्षण का प्रतिशत घटकर करीब 12.19 प्रतिशत रह गया है। यानी पिछली बार की तुलना में जिला प्रमुख पदों में ओबीसी का आरक्षण करीब 2.96 प्रतिशत कम हुआ है।
इसके उलट जिला प्रमुख पदों में एससी और एसटी वर्ग का आरक्षण प्रतिशत बढ़ा है। पिछली बार एससी वर्ग का आरक्षण करीब 18.18 प्रतिशत था, जो इस बार बढ़कर 19.51 प्रतिशत हो गया है। इसी तरह एसटी वर्ग का आरक्षण करीब 15.15 प्रतिशत से बढ़कर 17.07 प्रतिशत हो गया है।
राजस्थान में कुल 309 शहरी निकायों में चुनाव होने हैं। इनमें 10 नगर निगम, 51 नगर परिषद और 248 नगरपालिकाएं शामिल हैं।
निकाय प्रमुख पदों की लॉटरी में:
एससी के लिए 50 सीटें
एसटी के लिए 11 सीटें
ओबीसी के लिए 60 सीटें
188 पद अनारक्षित
रखे गए हैं।
प्रतिशत के हिसाब से शहरी निकाय प्रमुखों में एससी को करीब 16.18%, एसटी को 3.55% और ओबीसी को 19.41% आरक्षण मिला है।
गुर्जर नेता हिम्मत सिंह गुर्जर ने आरक्षण के आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि ओबीसी को 21 प्रतिशत राजनीतिक आरक्षण के हिसाब से सीटें दी जातीं तो 309 निकायों में करीब 66 पद और 41 जिला प्रमुख पदों में करीब 9 पद ओबीसी के लिए होने चाहिए थे। उन्होंने 60 निकाय प्रमुख और केवल 5 जिला प्रमुख पद मिलने को ओबीसी आबादी की तुलना में कम बताते हुए आंदोलन की चेतावनी दी है।
आरक्षण में सबसे पहले यह तय किया जाता है कि कुल निकायों या जिला परिषदों में कितने पद एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षित होंगे। उसके बाद लॉटरी यह तय करती है कि आरक्षित होने वाले पदों में कौन-सा निकाय या जिला किस वर्ग के खाते में जाएगा।यानी लॉटरी आरक्षण का कुल प्रतिशत तय नहीं करती, बल्कि निर्धारित आरक्षित पदों का क्षेत्रवार वितरण करती है।
आरक्षण प्रक्रिया में पहले एससी, उसके बाद एसटी और फिर ओबीसी की सीटें निर्धारित की जाती हैं। इसका एक महत्वपूर्ण कारण कुल राजनीतिक आरक्षण की 50 प्रतिशत सीलिंग है। एससी और एसटी को स्थानीय निकायों में उनकी जनसंख्या के अनुपात के आधार पर प्रतिनिधित्व दिया जाता है। इसके बाद उपलब्ध सीमा में ओबीसी आरक्षण निर्धारित किया जाता है।
लॉटरी में रोटेशन का सिद्धांत भी महत्वपूर्ण है। जो निकाय पिछली बार किसी विशेष वर्ग के लिए आरक्षित थे, उन्हें पहले अलग किया जाता है। इसके बाद संबंधित वर्ग की अधिक आबादी वाले निकायों में से लॉटरी के माध्यम से नई सीटें चुनी जाती हैं। इसी प्रक्रिया के कारण हर चुनाव में एक ही निकाय लगातार उसी वर्ग के लिए आरक्षित नहीं रहता। उदाहरण के तौर पर पिछली बार अजमेर नगर निगम का महापौर पद एससी महिला के लिए आरक्षित था, जबकि इस बार रोटेशन के बाद यह अनारक्षित महिला हो गया है।
आरक्षण लॉटरी ने कई बड़े राजनीतिक परिवारों और नेताओं के समीकरण बदल दिए हैं।
जैसलमेर में इस बार जिला प्रमुख पद एसटी वर्ग के लिए आरक्षित है। इससे पूर्व मंत्री सालेह मोहम्मद के परिवार की सीधी दावेदारी खत्म हो गई है।
नागौर में जिला प्रमुख पद एससी के लिए आरक्षित होने से मिर्धा परिवार और हनुमान बेनीवाल से जुड़े परिवारों की सीधी दावेदारी भी प्रभावित हुई है। इसी तरह डीडवाना-कुचामन और नागौर की आरक्षण श्रेणियों ने कई पुराने राजनीतिक दावेदारों के लिए रास्ता बंद कर दिया है।
महिला आरक्षण में भी पंचायत और निकाय चुनावों में अंतर रहेगा।
पंचायतीराज संस्थाओं में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा, जबकि नगरीय निकायों में यह 33 प्रतिशत रहेगा।
वर्ष 2008 में राजस्थान सरकार ने पंचायतों और निकायों में महिला आरक्षण 33 से बढ़ाकर 50 प्रतिशत किया था। लेकिन निकायों में 50 प्रतिशत आरक्षण को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई और 19 मई 2010 को इसे निरस्त कर दिया गया। इसके बाद नगरीय निकायों में महिला आरक्षण फिर 33 प्रतिशत हो गया। पंचायतीराज एक्ट में यह बदलाव प्रभावित नहीं हुआ, इसलिए पंचायतों में महिलाओं का 50 प्रतिशत आरक्षण जारी रहा।
ओबीसी आयोग ने 92 जातियों का सर्वे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत किया था। आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ही इस बार स्थानीय निकाय और पंचायतीराज चुनावों की आरक्षण प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई है। लेकिन जिला प्रमुख पदों में ओबीसी आरक्षण प्रतिशत घटने और निकायों में 21 प्रतिशत से कम सीटें मिलने के आरोपों के बाद यह मुद्दा राजनीतिक रूप से और गर्म होने के संकेत हैं।