



देवली के सीआईएसएफ परिसर में करीब एक वर्ष बाद नीम के पेड़ों के बीच नजर आई, वन अधिकारी बोले—अलग प्रजाति नहीं, आनुवंशिक कारणों से सफेद होता है रंग
टोंक। जिले के देवली स्थित केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के आरटीसी परिसर में करीब एक वर्ष बाद फिर दुर्लभ सफेद गिलहरी दिखाई दी है। हरे-भरे वन क्षेत्र में नीम के पेड़ों के झुरमुट के बीच उछलती-कूदती इस गिलहरी का वीडियो परिसर में रहने वाले एक जवान ने मोबाइल फोन से बनाया।
इससे पहले भी इसी सीआईएसएफ परिसर में सफेद गिलहरी दिखाई देने की सूचना सामने आई थी। उस समय इसे टोंक जिले में इस प्रकार की पहली दर्ज sighting बताया गया था। हालांकि राजस्थान में इससे पहले बांसवाड़ा और डूंगरपुर सहित अन्य स्थानों पर भी सफेद अथवा एल्बिनो गिलहरियों की मौजूदगी की खबरें सामने आ चुकी हैं। इसलिए इसे राजस्थान का निश्चित रूप से केवल दूसरा मामला बताने के बजाय दुर्लभ पुनः sighting कहना अधिक उचित है।
गिलहरी सीआईएसएफ के आरटीसी परिसर में पेड़ों के बीच दिखाई दी। कुछ देर तक वह शाखाओं पर घूमती रही। इसी दौरान वहां मौजूद जवान ने उसका वीडियो बना लिया।
परिसर में पर्याप्त हरियाली, पुराने पेड़ और अपेक्षाकृत सुरक्षित वातावरण होने के कारण यहां गिलहरियों सहित विभिन्न छोटे वन्य जीवों को अनुकूल आवास मिलता है।
सहायक वन संरक्षक अनुराग महर्षि के अनुसार सफेद गिलहरी कोई अलग प्रजाति नहीं है। सामान्य गिलहरी में आनुवंशिक बदलाव के कारण शरीर में रंग बनाने वाले वर्णक की कमी हो सकती है, जिससे उसका रंग सफेद दिखाई देता है।
विशेषज्ञों के अनुसार वास्तविक एल्बिनो गिलहरी की पहचान सफेद बालों के साथ गुलाबी या लाल आंखों से होती है। सफेद बाल लेकिन सामान्य रंग की आंखें होने पर वह एल्बिनिज्म के बजाय ल्यूसिज्म अथवा अन्य रंग-परिवर्तन का मामला भी हो सकता है। इसलिए केवल वीडियो या दूर से दिखाई देने के आधार पर एल्बिनिज्म की अंतिम पुष्टि करना कठिन है।
वन्यजीव संबंधी स्रोतों में एल्बिनो गिलहरी पैदा होने की संभावना लगभग एक लाख में एक बताई जाती है। यह आनुवंशिक स्थिति होने के कारण सफेद गिलहरी की संतानों का भी सफेद होना जरूरी नहीं है।
सफेद रंग के कारण ऐसी गिलहरियां पेड़ों और झाड़ियों में आसानी से छिप नहीं पातीं। इससे वे शिकारी पक्षियों तथा दूसरे जीवों को सामान्य गिलहरियों की तुलना में जल्दी दिखाई दे सकती हैं।
करीब एक वर्ष पहले भी देवली के इसी सीआईएसएफ परिसर में सफेद गिलहरी दिखाई दी थी। इसके बाद लंबे समय तक उसकी मौजूदगी की कोई सूचना नहीं मिली। अब दोबारा गिलहरी नजर आने से वन्यजीव प्रेमियों और प्रकृति का अध्ययन करने वालों में उत्सुकता बढ़ गई है।
हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि हाल में दिखाई दी गिलहरी वही पुरानी गिलहरी है या इस क्षेत्र में कोई दूसरी सफेद गिलहरी मौजूद है। इसकी पुष्टि निरंतर निगरानी, स्पष्ट तस्वीरों और विशेषज्ञ परीक्षण से ही संभव होगी।
राजस्थान के प्रतापगढ़ क्षेत्र स्थित सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य को बड़ी भूरी उड़न गिलहरी के महत्वपूर्ण आवास के रूप में जाना जाता है। यह निशाचर जीव वास्तव में उड़ता नहीं, बल्कि शरीर की त्वचा की झिल्ली की सहायता से एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक ग्लाइड करता है। राजस्थान राज्य जैव विविधता बोर्ड की रिपोर्ट में भी सीतामाता अभयारण्य में उड़न गिलहरी की मौजूदगी और आवास का अध्ययन किया गया है।