



जोधपुर। राजस्थान के विद्युत वितरण निगमों की ओर से वर्षों पुराने बिजली कनेक्शनों पर अतिरिक्त प्रतिभूति राशि यानी सिक्योरिटी डिपॉजिट जमा कराने की मांग को लेकर एक विद्युत उपभोक्ता ने राजस्थान हाईकोर्ट से जनहित में हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया है।
प्रस्तुत निवेदन में कहा गया है कि यह किसी एक उपभोक्ता की व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि प्रदेश के लाखों बिजली उपभोक्ताओं से जुड़ा विषय है। उपभोक्ता का कहना है कि कनेक्शन जारी करते समय निर्धारित सुरक्षा राशि पहले ही जमा कराई जा चुकी होती है। इसके बावजूद वर्षों बाद दोबारा अतिरिक्त राशि मांगने से आम परिवारों पर आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
निवेदन में आरोप लगाया गया है कि कई उपभोक्ताओं को यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया जा रहा कि अतिरिक्त प्रतिभूति राशि किस कानूनी प्रावधान, नियम अथवा गणना के आधार पर निर्धारित की गई है।
कहा गया है कि केवल राशि का नोटिस जारी कर देना पर्याप्त नहीं है। संबंधित विद्युत वितरण निगम को प्रत्येक उपभोक्ता को उसकी औसत खपत, स्वीकृत भार, पहले से जमा सुरक्षा राशि और अतिरिक्त मांग की गणना का पूरा विवरण उपलब्ध कराना चाहिए।
प्रार्थना पत्र में कहा गया कि महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक कठिनाइयों के दौर में वर्षों बाद अचानक अतिरिक्त सिक्योरिटी डिपॉजिट की मांग आम एवं मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए परेशानी का कारण बन सकती है।
उपभोक्ता ने कहा कि यदि ऐसी मांग किसी वैधानिक नियम के तहत की जा रही है, तब भी संबंधित प्रक्रिया पारदर्शी, न्यायसंगत और उपभोक्ता को समझ आने योग्य होनी चाहिए।
हाईकोर्ट से अनुरोध किया गया है कि अतिरिक्त सुरक्षा राशि की मांग करने से पहले उपभोक्ताओं को नोटिस का जवाब देने और अपनी आपत्ति प्रस्तुत करने का उचित अवसर दिलाया जाए।
निवेदन में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि उपभोक्ता का पक्ष सुने बिना बिजली कनेक्शन काटने, विलंब शुल्क लगाने या अन्य दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।
प्रार्थना पत्र में राजस्थान सरकार और राज्य के विद्युत वितरण निगमों से अतिरिक्त प्रतिभूति राशि संबंधी नीति का औचित्य, कानूनी आधार और लागू प्रक्रिया स्पष्ट कराने का अनुरोध किया गया है।
यह भी मांग की गई है कि निगम यह बताएं कि पहले से जमा सुरक्षा राशि का समायोजन किस प्रकार किया गया और अतिरिक्त राशि की गणना किन मानकों के आधार पर हुई।
उपभोक्ता ने न्यायालय से आग्रह किया है कि जनहित और उपभोक्ता अधिकारों को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त सुरक्षा राशि संबंधी नीति की समीक्षा कराई जाए।
निवेदन में कहा गया है कि किसी भी कार्रवाई को विधि के अनुरूप, निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से ही लागू किया जाना चाहिए। उपभोक्ताओं को आवश्यक दस्तावेज, गणना पत्र और शिकायत निवारण का प्रभावी मंच उपलब्ध कराया जाए।
प्रार्थना पत्र में हाईकोर्ट से मामले को जनहित का विषय मानकर उचित विधिक प्रक्रिया के अनुसार संज्ञान लेने पर विचार करने का अनुरोध किया गया है।
हालांकि, किसी पत्र अथवा अभ्यावेदन को औपचारिक जनहित याचिका के रूप में स्वीकार करना न्यायालय के विवेक और लागू न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। न्यायालय यदि आवश्यक समझे तो राज्य सरकार और वितरण निगमों से जवाब मांग सकता है।