



जयपुर। राजस्थान में करीब डेढ़ वर्ष से लंबित पंचायती राज और स्वायत्त शासन संस्थाओं के चुनावों को लेकर एक बार फिर संशय गहरा गया है। राजस्थान हाईकोर्ट ने चुनाव कराने के लिए 31 जुलाई 2026 की समयसीमा तय रखी है, लेकिन अब तक आरक्षण निर्धारण से जुड़ा आवश्यक डेटा राज्य निर्वाचन आयोग को उपलब्ध नहीं हो पाया है।
राज्य निर्वाचन आयोग ने पंचायती राज विभाग और स्वायत्त शासन विभाग को 15 जून को एक बार फिर रिमाइंडर पत्र भेजकर आरक्षण से संबंधित डेटा उपलब्ध कराने को कहा है। बताया जा रहा है कि यह पत्र अब अंतिम पत्र की तरह माना जा रहा है, क्योंकि तय समयसीमा के भीतर चुनाव कराने के लिए आवश्यक प्रारंभिक प्रक्रियाएं अब तक पूरी नहीं हो सकी हैं।
चुनाव प्रक्रिया शुरू करने से पहले एससी, एसटी, ओबीसी और महिला आरक्षण का निर्धारण जरूरी है। आरक्षण तय होने के बाद ही आरक्षित सीटों का निर्धारण, वार्ड और पंचायत स्तर की स्थिति स्पष्ट करना, चुनाव कार्यक्रम तैयार करना और अधिसूचना जारी करने जैसी प्रक्रियाएं आगे बढ़ सकती हैं। लेकिन सरकार के स्तर पर अब तक आरक्षण को लेकर अंतिम स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है।
ओबीसी प्रतिनिधित्व आयोग की रिपोर्ट को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। आयोग का कार्यकाल सितंबर तक बताया जा रहा है। ऐसे में जब तक ओबीसी प्रतिनिधित्व से जुड़ी रिपोर्ट और आरक्षण निर्धारण की प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक चुनावी कार्यक्रम जारी करना व्यावहारिक रूप से कठिन माना जा रहा है।
प्रदेश में चुनाव के लिए अब बहुत कम समय शेष है। 31 जुलाई की समयसीमा को देखते हुए केवल 39 दिन बचे हैं, जबकि आरक्षण निर्धारण, सीटों की सूची, चुनावी कार्यक्रम, नामांकन, मतदान और मतगणना जैसी पूरी प्रक्रिया के लिए कम से कम ढाई से तीन महीने का समय आवश्यक माना जा रहा है। ऐसे में तय समयसीमा में चुनाव हो पाना मुश्किल दिखाई दे रहा है।
सरकार के मंत्रियों ने कई बार सार्वजनिक रूप से कहा है कि राज्य सरकार चुनाव कराने के लिए तैयार है। विधि मंत्री जोगाराम पटेल ने सबसे पहले सरकार की तैयारी की बात कही थी। इसके बाद स्वायत्त शासन मंत्री झाबर सिंह खर्रा और पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर ने भी चुनावों को लेकर सरकार की तत्परता दोहराई थी। अब पंचायतीराज राज्य मंत्री ओटाराम देवासी ने भी कहा है कि सरकार 31 जुलाई को चुनाव कराने के लिए तैयार है।
हालांकि स्थिति इसके विपरीत दिखाई दे रही है, क्योंकि जिन विभागों पर आरक्षण निर्धारण और संबंधित डेटा उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है, उन्हीं विभागों से अब तक राज्य निर्वाचन आयोग को संतोषजनक जवाब नहीं मिला है। चुनाव आयोग की ओर से बार-बार पत्र लिखे जाने के बावजूद प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई है।
बताया जा रहा है कि राज्य निर्वाचन आयोग सरकार के पंचायती राज और स्वायत्त शासन विभाग को अब तक करीब 10 अलग-अलग पत्र लिख चुका है। इनमें से केवल एक पत्र का जवाब आया था, जिसमें बताया गया कि काम जारी है। आयोग को अब तक चुनाव कराने योग्य पूर्ण और स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पाई है।
चर्चा यह भी है कि सरकार की “वन स्टेट, वन इलेक्शन” की मंशा के कारण पूरी प्रक्रिया लंबी खिंच रही है। पंचायत और निकाय चुनावों को एक साथ कराने की तैयारी के चलते आरक्षण, परिसीमन और चुनावी कार्यक्रमों के समन्वय में देरी हो रही है। हालांकि इस संबंध में सरकार की ओर से कोई स्पष्ट आधिकारिक स्थिति सामने नहीं आई है।
हाईकोर्ट ने मामले में समयबद्ध चुनाव कराने को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए थे। कोर्ट ने मौखिक रूप से भी चुनावी प्रक्रिया में देरी को लेकर कई टिप्पणियां की थीं, लेकिन सरकारी तंत्र में यह तर्क दिया जा रहा है कि जब तक ओबीसी प्रतिनिधित्व आयोग की रिपोर्ट नहीं आती, तब तक आरक्षण निर्धारण पूरा नहीं हो सकता। इसी कारण चुनाव कार्यक्रम आगे बढ़ना कठिन है।
अब माना जा रहा है कि जुलाई के पहले सप्ताह में सरकार की ओर से हाईकोर्ट से अतिरिक्त समय मांगा जा सकता है। अदालतों में फिलहाल दीर्घकालीन अवकाश है और नियमित सुनवाई सीमित रूप से हो रही है। ऐसे में जुलाई के पहले सप्ताह में ही चुनाव कराने के लिए अतिरिक्त समय मांगने की संभावना जताई जा रही है।
प्रदेश में जिन संस्थाओं के चुनाव लंबित हैं, उनमें 14,403 ग्राम पंचायतें, 457 पंचायत समितियां और 41 जिला परिषद शामिल हैं। इसके अलावा राज्य में वर्तमान में कुल 309 शहरी स्थानीय निकाय भी हैं, जिनके चुनावों को लेकर भी प्रक्रिया आगे बढ़नी है।
राजनीतिक दृष्टि से यह मामला बेहद महत्वपूर्ण है। पंचायत और निकाय चुनाव गांव से लेकर शहर तक स्थानीय नेतृत्व और राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करते हैं। ऐसे में चुनाव में देरी से न केवल राजनीतिक दलों की तैयारी प्रभावित हो रही है, बल्कि स्थानीय स्वशासन की लोकतांत्रिक प्रक्रिया भी लंबित बनी हुई है।
फिलहाल राज्य निर्वाचन आयोग आरक्षण डेटा का इंतजार कर रहा है। जब तक संबंधित विभाग आवश्यक जानकारी उपलब्ध नहीं कराते, तब तक चुनाव कार्यक्रम जारी करना संभव नहीं होगा। अब सबकी नजर सरकार के अगले कदम और हाईकोर्ट में संभावित अतिरिक्त समय मांगने की प्रक्रिया पर टिकी हुई है।