



राजस्थान विश्वविद्यालय की पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में हाईटेक जालसाजी का मामला सामने आया है। भर्ती परीक्षाओं में पेपरलीक और फर्जी डिग्री के मामलों के बाद अब शैक्षणिक दस्तावेजों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आधुनिक डिजिटल एडिटिंग टूल्स की मदद से हेरफेर करने का मामला सामने आया है। प्रारंभिक जांच में कुछ अभ्यर्थियों द्वारा NET-JRF प्रमाणपत्रों और अन्य शैक्षणिक दस्तावेजों में बदलाव किए जाने की आशंका जताई गई है।
जानकारी के अनुसार राजस्थान विश्वविद्यालय में पीएचडी दाखिले के लिए करीब 3,000 आवेदन प्राप्त हुए थे। इनमें से लगभग 10 प्रतिशत आवेदनों में दस्तावेजों को लेकर संदेह सामने आया है। कुछ अभ्यर्थियों की शिकायत के बाद जब विश्वविद्यालय ने गहन जांच कराई तो कई आवेदनों में तकनीकी छेड़छाड़ के संकेत मिले। इसके बाद विश्वविद्यालय ने पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया को फिलहाल रोक दिया है और अब प्रत्येक आवेदन की नए सिरे से जांच की जा रही है।
विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि दस्तावेजों में की गई यह हेरफेर सामान्य फर्जीवाड़े जैसी नहीं है। आरोप है कि अभ्यर्थियों ने AI और आधुनिक एडिटिंग टूल्स की मदद से प्रमाणपत्रों में इतनी सफाई से बदलाव किए कि पहली नजर में उन्हें पकड़ पाना मुश्किल हो रहा है। जांच में सबसे ज्यादा गड़बड़ी NET-JRF प्रमाणपत्रों में किए जाने की बात सामने आई है, क्योंकि इन्हीं प्रमाणपत्रों के आधार पर वरीयता सूची में अभ्यर्थियों को लाभ मिल सकता था।
बताया जा रहा है कि कुछ अभ्यर्थियों ने वरीयता सूची में ऊपर आने के लिए NET स्कोर, पासिंग ईयर, कैटेगरी और पात्रता से जुड़े विवरणों में बदलाव किए। एक मामले में छात्र ने दो अलग-अलग वर्षों में दी गई NET परीक्षा के विवरणों को जोड़कर नया प्रमाणपत्र तैयार करने का प्रयास किया। आरोप है कि उसने एक वर्ष का NET स्कोर और दूसरे वर्ष का पासिंग ईयर मिलाकर प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया।
एक अन्य मामले में अभ्यर्थी के NET परिणाम को अलग कैटेगरी में दिखाने की बात सामने आई है। इसी तरह एक अभ्यर्थी ने कथित रूप से वर्ष 2024 में NET क्वालीफाई किया था, लेकिन पीएचडी की चालू विज्ञप्ति की शर्तों में फिट बैठने के लिए प्रमाणपत्र में परीक्षा वर्ष बदलने का प्रयास किया। विश्वविद्यालय अब ऐसे सभी मामलों की मूल दस्तावेजों के आधार पर जांच कर रहा है।
फर्जीवाड़े का संदेह सामने आने के बाद जांच समिति ने संबंधित अभ्यर्थियों को मूल दस्तावेजों के साथ सत्यापन के लिए बुलाया। इस दौरान विश्वविद्यालय प्रशासन को चौंकाने वाली प्रतिक्रियाएं भी मिलीं। बताया जा रहा है कि कुछ अभ्यर्थियों ने मोबाइल फोन बंद कर लिए, जबकि कुछ ने विश्वविद्यालय कर्मचारियों से फोन पर अभद्रता और धमकी भरा व्यवहार किया।
राजस्थान विश्वविद्यालय की कुलगुरु प्रो. अल्पना कटेजा ने कहा कि विश्वविद्यालय को कुछ शिकायतें प्राप्त हुई थीं। जांच कराई गई तो दस्तावेजों में AI की मदद से हेरफेर की बात सामने आई। उन्होंने कहा कि दस्तावेज सत्यापन के समय भी ऐसे मामले पकड़े जा सकते थे, लेकिन विश्वविद्यालय पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से पूरा करना चाहता है। योग्य विद्यार्थियों के साथ किसी प्रकार का अन्याय न हो, इसके लिए प्रत्येक आवेदन की पुनः जांच की जा रही है।
विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि पीएचडी प्रवेश जैसी शैक्षणिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और मेरिट सर्वोच्च प्राथमिकता है। यदि किसी अभ्यर्थी ने गलत दस्तावेजों के आधार पर प्रवेश पाने का प्रयास किया है तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कितने आवेदनों में वास्तविक रूप से फर्जीवाड़ा हुआ है।
इस मामले ने उच्च शिक्षा संस्थानों में डिजिटल दस्तावेज सत्यापन की आवश्यकता को भी गंभीरता से सामने ला दिया है। AI और एडिटिंग टूल्स के बढ़ते उपयोग के बीच विश्वविद्यालयों और भर्ती संस्थाओं के लिए अब केवल स्कैन कॉपी या अपलोडेड दस्तावेजों पर भरोसा करना जोखिमपूर्ण हो सकता है। मूल प्रमाणपत्र, जारी करने वाली एजेंसी से डिजिटल सत्यापन और तकनीकी जांच व्यवस्था को मजबूत करना समय की जरूरत बन गया है।
फिलहाल राजस्थान विश्वविद्यालय ने पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया को पारदर्शी बनाए रखने के लिए आवेदनों की दोबारा जांच शुरू कर दी है। विश्वविद्यालय का कहना है कि योग्य और वास्तविक अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा करते हुए ही आगे की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। जांच पूरी होने के बाद गड़बड़ी करने वाले अभ्यर्थियों पर कार्रवाई और प्रवेश प्रक्रिया की अगली स्थिति स्पष्ट की जाएगी।