Friday, 19 June 2026

राजस्थान में सरकारी खरीद और टेंडर में मेक इन इंडिया प्रोडक्ट को मिलेगी प्राथमिकता, वित्त विभाग ने जारी किया सर्कुलर


राजस्थान में सरकारी खरीद और टेंडर में मेक इन इंडिया प्रोडक्ट को मिलेगी प्राथमिकता, वित्त विभाग ने जारी किया सर्कुलर

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जयपुर। राजस्थान सरकार अब सरकारी विभागों में खरीदे जाने वाले सामान, माल सप्लाई और टेंडर प्रक्रिया में मेक इन इंडिया प्रोडक्ट को प्राथमिकता देगी। इसके लिए वित्त विभाग ने सर्कुलर जारी कर नए प्रावधान लागू किए हैं। सर्कुलर के अनुसार सभी विभागों को टेंडर की शर्तें इस प्रकार तय करने के निर्देश दिए गए हैं, जिससे स्थानीय सप्लायर्स और स्वदेशी कंपनियों को बढ़ावा मिल सके। सरकार के इस निर्णय का असर बड़े सरकारी प्रोजेक्ट्स पर भी देखने को मिलेगा, जहां अब स्थानीय कंपनियों को अधिक अवसर मिलने की संभावना है।

वित्त विभाग ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी टेंडर में स्वदेशी कंपनियों या लोकल सप्लायर्स के साथ भेदभाव करने वाली अथवा उन्हें अनावश्यक रूप से बाहर करने वाली शर्तें रखी जाती हैं, तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ विभागीय स्तर पर कार्रवाई की जाएगी। सभी विभागों को इन प्रावधानों का सख्ती से पालन करने के निर्देश दिए गए हैं। सरकारी टेंडर में कंपनी या फर्म का टर्नओवर, अनुभव, उत्पादन क्षमता और वित्तीय क्षमता से जुड़ी शर्तें इस प्रकार तय करनी होंगी, जिससे भारतीय कंपनियां बिना उचित कारण के प्रतिस्पर्धा से बाहर न हों।

सर्कुलर के अनुसार टेंडर दस्तावेजों में विदेशी प्रमाण-पत्रों, अनुचित तकनीकी स्पेसिफिकेशन, किसी विशेष ब्रांड या मॉडल का उल्लेख करना स्थानीय कंपनियों के खिलाफ प्रतिबंधात्मक और भेदभावपूर्ण माना जाएगा। यदि किसी मामले में भारतीय मानक उपलब्ध नहीं हैं, तो विदेशी प्रमाण-पत्रों का प्रावधान सक्षम स्तर से मंजूरी लिए बिना नहीं रखा जा सकेगा। मेक इन इंडिया को वरीयता देने की पूरी प्रक्रिया का उल्लेख टेंडर डॉक्यूमेंट में करना अनिवार्य होगा और टेंडर प्रक्रिया के दौरान इसमें मनमाने बदलाव नहीं किए जा सकेंगे।

सरकारी विभागों में सप्लाई किए जाने वाले आइटम्स में स्थानीय सामग्री कम से कम 50 प्रतिशत होनी आवश्यक होगी। हर टेंडर में भाग लेने वाली कंपनी या फर्म को यह सेल्फ डिक्लेरेशन देना होगा कि उसके प्रोडक्ट मेक इन इंडिया के दायरे में आते हैं। 10 करोड़ रुपए से अधिक के टेंडर में सप्लाई करने वाली फर्म को वैधानिक ऑडिटर, कॉस्ट ऑडिटर या स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट से स्थानीय सामग्री की मात्रा का प्रमाण-पत्र भी देना होगा। इन दावों की जांच की जाएगी और गलत प्रमाण-पत्र पाए जाने पर संबंधित फर्म को दो साल तक के लिए ब्लैक लिस्ट किया जा सकेगा।

वित्त विभाग ने स्थानीय सामग्री की परिभाषा भी स्पष्ट की है। यदि किसी टेंडर में एक से अधिक वस्तुओं की खरीद होनी है और उनकी दरें अलग-अलग हैं, तो स्थानीय विक्रेता वही माना जाएगा, जिसके कम से कम 50 प्रतिशत आइटम भारत में बने हुए हों। विदेश से उत्पाद मंगवाकर केवल उनकी मरम्मत, सुधार या रिफर्बिश करने को स्थानीय निर्माण नहीं माना जाएगा। विभाग ने साफ किया है कि रिफर्बिशिंग मैन्युफैक्चरिंग के समान नहीं है, क्योंकि इसमें कोई नया माल अस्तित्व में नहीं आता। इसी तरह आयातित वस्तुओं को केवल रिसेल करने वाले विक्रेताओं को भी लोकल आइटम सप्लायर नहीं माना जाएगा।

केंद्र सरकार की ओर से मेक इन इंडिया प्रोडक्ट को बढ़ावा देने के लिए पहले ही गाइडलाइन जारी की जा चुकी है। केंद्र सरकार के प्रोजेक्ट्स में स्थानीय कंपनियों को प्राथमिकता देने का प्रावधान पहले से लागू है। इसी तर्ज पर अब राजस्थान सरकार ने भी सरकारी खरीद, माल सप्लाई और सरकारी कामों के टेंडर में स्वदेशी कंपनियों को बढ़ावा देने के लिए यह सर्कुलर जारी किया है।

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