



राजस्थान हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों और तलाक संबंधी मामलों में एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि फैमिली कोर्ट में याचिका दायर करने के लिए कोई अधिकतम समय सीमा लागू नहीं होती। अदालत ने केवल समय सीमा के आधार पर मामला खारिज करने के बूंदी फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त कर प्रकरण को पुनः सुनवाई के लिए वापस भेज दिया।
खंडपीठ, जिसमें जस्टिस इन्द्रजीत सिंह और जस्टिस अशोक कुमार जैन शामिल थे, ने कहा कि वैवाहिक विवाद निरंतर प्रकृति के होते हैं और इन्हें “कंटीन्यूइंग कॉज ऑफ एक्शन” माना जाता है। इसलिए तलाक की याचिका किसी भी समय प्रस्तुत की जा सकती है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 के अंतर्गत आने वाले मामलों पर परिसीमा अधिनियम की समय-सीमा संबंधी धाराएं लागू नहीं होतीं, जिससे ऐसे मामलों में देरी के आधार पर याचिका खारिज नहीं की जा सकती।
मामले में अपीलकर्ता महिला ने बताया कि उसका विवाह वर्ष 1994 में नाबालिग अवस्था में हुआ था और वर्ष 2008 में वैवाहिक विवाद के चलते वह अपने मायके चली गई थी। वर्ष 2020 में फैमिली कोर्ट में याचिका दायर करने पर कोर्ट ने इसे 12 वर्ष पुराना मामला मानकर खारिज कर दिया था।
हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने क्रूरता और परित्याग जैसे मूल मुद्दों पर विचार नहीं किया, जो कि तलाक के लिए महत्वपूर्ण आधार हैं। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत का आदेश रद्द करते हुए मामले की पुनः सुनवाई के निर्देश दिए।