Wednesday, 11 February 2026

राज्य बजट में 7 लाख कर्मचारियों की उपेक्षा का आरोप, कर्मचारी संगठनों में रोष


राज्य बजट में 7 लाख कर्मचारियों की उपेक्षा का आरोप, कर्मचारी संगठनों में रोष

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अजमेर। राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत बजट 2026–27 को लेकर कर्मचारी संगठनों में असंतोष उभर कर सामने आया है। अखिल राजस्थान राज्य संयुक्त कर्मचारी महासंघ (एकीकृत), अजमेर के संभाग प्रभारी एवं जिला अध्यक्ष कांति कुमार शर्मा ने बजट को राज्य के लगभग 7 लाख कर्मचारियों की “घोर उपेक्षा” बताया है। उनका आरोप है कि कर्मचारियों के हितों से जुड़ी प्रमुख मांगों पर सरकार ने कोई ठोस घोषणा नहीं की और केवल बीमा संबंधी घोषणा कर औपचारिकता निभाई गई।

कर्मचारी संगठनों का कहना है कि पूर्व में सातवें वेतन आयोग के दौरान केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित 10 वेतन स्लैब को राज्य में 14 स्लैब में परिवर्तित किए जाने से वेतन विसंगतियां उत्पन्न हुई थीं, जिनका समाधान आज तक नहीं हो सका। वर्तमान बजट में आठवें वेतन आयोग के संदर्भ में हाई पावर कमेटी गठन की बात कही गई है, लेकिन कर्मचारियों का मानना है कि इससे तत्काल कोई वित्तीय लाभ मिलने की संभावना नहीं है। उनका तर्क है कि केंद्र स्तर पर भी अभी केवल प्रारंभिक प्रक्रिया शुरू हुई है और राज्य में इसके क्रियान्वयन को लेकर स्पष्ट रोडमैप सामने नहीं आया है।

महासंघ ने यह भी कहा कि चयनित वेतनमान 9, 18, 27 के स्थान पर 8, 16, 24, 32 करने, संविदा कर्मचारियों के नियमितीकरण, ठेका प्रथा समाप्त करने तथा रोडवेज कर्मचारियों को राज्य कर्मचारी का दर्जा देने जैसे मुद्दों पर कोई निर्णय नहीं लिया गया। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, सहायक कर्मचारियों और वाहन चालकों के मानदेय, भत्तों एवं सेवा शर्तों को लेकर भी बजट में कोई विशेष प्रावधान नहीं किया गया।

पेंशनर्स से संबंधित मांगों—जैसे 60, 65, 70, 75 और 80 वर्ष की आयु पर क्रमशः 5%, 10%, 15% और 20% अतिरिक्त पेंशन—पर भी कोई घोषणा नहीं होने से सेवानिवृत्त कर्मचारियों में निराशा देखी जा रही है। वहीं 2004 के बाद नियुक्त कर्मचारियों के एनपीएस अंशदान और उससे जुड़े वित्तीय प्रावधानों को लेकर भी स्पष्टता की मांग की गई है।

कर्मचारी महासंघ का कहना है कि यदि मांगों पर विचार नहीं किया गया तो भविष्य में आंदोलन की राह अपनाई जा सकती है। संगठन का दावा है कि प्रदेश भर में कर्मचारियों में असंतोष व्याप्त है और सरकार को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए। फिलहाल सरकार की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

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