Thursday, 05 February 2026

ब्यावर के सनातन धर्म राजकीय महाविद्यालय में आयोजित राजस्थान सोशियोलॉजिकल एसोसिएशन की 31 वीं इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस प्रिंसिपल मनोज बेहरवाल के बयान से मचा विवाद


ब्यावर के सनातन धर्म राजकीय महाविद्यालय में आयोजित राजस्थान सोशियोलॉजिकल एसोसिएशन की 31 वीं इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस प्रिंसिपल मनोज बेहरवाल के बयान से मचा विवाद

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अजमेर। सम्राट पृथ्वीराज चौहान गवर्नमेंट कॉलेज, अजमेर के प्रिंसिपल मनोज बेहरवाल के एक बयान ने शैक्षणिक और सामाजिक हलकों में बहस छेड़ दी है। ब्यावर के सनातन धर्म राजकीय महाविद्यालय में आयोजित राजस्थान सोशियोलॉजिकल एसोसिएशन की 31 वीं इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने आज़ादी के समय भारत-पाकिस्तान और प्रमुख नेताओं को लेकर विवादित टिप्पणी की। यह सम्मेलन 23 और 24 जनवरी को आयोजित हुआ था, जिसमें 24 जनवरी को दिए गए उनके वक्तव्य का वीडियो और बयान अब चर्चा में है।

मनोज बेहरवाल ने अपने संबोधन में कहा कि 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान का राजनीतिक उदय हुआ और 15 अगस्त 1947 की सुबह करीब दस-साढ़े दस बजे भारत का उदय हुआ। इसी संदर्भ में उन्होंने यह टिप्पणी की कि पाकिस्तान भारत से “12 घंटे बड़ा” है और उसे “बड़ा भाई” कहा जा सकता है। इस कथन को लेकर कई शिक्षाविदों और राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।

अपने वक्तव्य में उन्होंने आज़ादी के समय के प्रमुख नेताओं का जिक्र करते हुए कहा कि उस दौर में देश में केवल तीन ही लोकप्रिय नेता थे—महात्मा गांधी, मोहम्मद अली जिन्ना और डॉ. भीमराव अंबेडकर। उन्होंने यह भी कहा कि उस समय नेहरू उतने लोकप्रिय नहीं थे। इसके समर्थन में उन्होंने एक प्रसंग सुनाया कि विदेशी पत्रकार इंटरव्यू के लिए पहले गांधी जी के पास गए, लेकिन वे सो चुके थे। इसके बाद वे जिन्ना के पास पहुंचे, जहां वे या तो बाहर गए हुए थे या विश्राम कर रहे थे। अंत में पत्रकार डॉ. अंबेडकर के पास पहुंचे, जो देर रात तक हिंदू कोड बिल की तैयारी में जुटे हुए थे।

बेहरवाल के अनुसार, जब पत्रकारों ने अंबेडकर से इतनी देर तक जागने का कारण पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया कि “उन दोनों का समाज जाग चुका है, इसलिए वे सो गए हैं, लेकिन मेरा समाज अभी सो रहा है, इसलिए मुझे जागना पड़ रहा है।” बेहरवाल ने इस कथन को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ते हुए कहा कि समाज और देश एक ही हैं।

हालांकि, उनके इन बयानों को लेकर अकादमिक मंच पर ऐतिहासिक तथ्यों की व्याख्या और भाषा चयन को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। कुछ शिक्षाविद इसे वैचारिक विमर्श बता रहे हैं, जबकि कई लोग इसे तथ्यात्मक और संवेदनशील मुद्दों पर गैर-जिम्मेदार टिप्पणी मान रहे हैं।

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