Wednesday, 04 March 2026

जेलों में कैदियों की शिकायतों के लिए बनेगी निवारण समिति, हाईकोर्ट ने पानी और स्वच्छता पर सख्त निर्देश दिए


जेलों में कैदियों की शिकायतों के लिए बनेगी निवारण समिति, हाईकोर्ट ने पानी और स्वच्छता पर सख्त निर्देश दिए

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जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रदेश की जेलों में बंद कैदियों की शिकायतों के प्रभावी निवारण के लिए राज्य सरकार को अहम निर्देश दिए हैं। अदालत ने राज्य सरकार से कहा है कि कैदियों की समस्याओं के समाधान हेतु एक शिकायत निवारण समिति का गठन किया जाए। इसके साथ ही अंतरिम आदेश में हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि कैदियों को पर्याप्त मात्रा में पीने और कपड़े धोने के लिए पानी उपलब्ध कराने की स्पष्ट नीति बनाई जाए तथा उनकी व्यक्तिगत स्वच्छता और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर ठोस कदम उठाए जाएं। अदालत ने यह टिप्पणी भी की कि राजस्थान जैसे गर्म प्रदेश में कैदियों को सप्ताह में केवल एक बार कपड़े धोने की अनुमति देना कल्पना से परे है।

हाईकोर्ट ने कहा कि वर्ष 2022 में जेल नियमों में संशोधन किए जाने के बावजूद जमीनी हालात पूरी तरह अलग हैं। आज भी कई जेलों में कैदियों को पीने के पानी, कपड़े धोने के लिए पर्याप्त पानी, साबुन और अन्य बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि शिकायत निवारण समिति में प्रत्येक जिले के जिला मजिस्ट्रेट, जिला न्यायाधीश, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM), सामाजिक न्याय अधिकारी, जेल अधीक्षक और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) के सचिव को शामिल किया जाए। साथ ही इस समिति के गठन की जानकारी प्रत्येक जेल के नोटिस बोर्ड पर अनिवार्य रूप से चस्पा की जाए, ताकि कैदी सीधे अपनी शिकायत समिति तक पहुंचा सकें। अदालत ने इस मामले में गृह मंत्रालय को भी पक्षकार बनाए जाने के निर्देश दिए हैं।

यह आदेश न्यायमूर्ति अनूप कुमार ढंड ने पीपुल्स वॉच राजस्थान द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में जेलों में कैदियों को पर्याप्त पानी, साबुन और स्वच्छता सुविधाएं नहीं मिलने का मुद्दा उठाया गया था। अदालत ने इस स्थिति को गंभीर मानते हुए राज्य सरकार से पूछा कि कैदियों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने को लेकर उनकी स्पष्ट नीति क्या है।

इसके अलावा हाईकोर्ट ने प्रदेश के सभी जिला न्यायाधीशों, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेटों और डीएलएसए सचिवों को निर्देश दिया है कि वे तीन सप्ताह के भीतर अपने-अपने क्षेत्रों की जेलों का औचक निरीक्षण करें। निरीक्षण के दौरान कैदियों से सीधे संवाद कर उनकी समस्याओं को समझें और इस संबंध में विस्तृत रिपोर्ट न्यायालय में पेश करें। अदालत ने टिप्पणी की कि कैदियों की व्यावहारिक कठिनाइयों पर आमतौर पर कोई ध्यान नहीं देता और उन्हें केवल अपराधी के रूप में देखा जाता है, जिससे उनकी आवाज अनसुनी रह जाती है।

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि जेल नियम, 1951 के तहत कैदियों के लिए कई प्रावधान हैं। नियम 114 के अनुसार कैदियों को सप्ताह में एक बार कपड़े धोने की अनुमति है और जेल प्रशासन द्वारा साबुन उपलब्ध कराया जाना चाहिए। वहीं नियम 120 के अनुसार पुरुष कैदियों को प्रति सप्ताह तीन-चौथाई औंस और महिला कैदियों को डेढ़ औंस धोने का सोडा दिया जाना निर्धारित है। हालांकि वर्ष 2022 में नियमों में संशोधन के बावजूद इन प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है। राज्य सरकार की ओर से सरकारी अधिवक्ता सुमन शेखावत ने अदालत में दलील दी कि नियमों के तहत निर्धारित सुविधाएं दी जा रही हैं और न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है, लेकिन हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

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