



राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने आरटीई (राइट टू एजुकेशन) के तहत प्रवेश से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि प्रदेश के निजी स्कूलों को प्री-प्राइमरी से पहली कक्षा तक आरटीई के अंतर्गत बच्चों को प्रवेश देना होगा। खंडपीठ ने कहा कि निजी स्कूल जिस भी कक्षा में प्रवेश देते हैं, उसी कक्षा में 25 प्रतिशत सीटों पर आरटीई के तहत प्रवेश देना अनिवार्य होगा। यह फैसला कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायमूर्ति बी.एस. संधू की खंडपीठ ने अभ्युत्थानम सोसायटी व अन्य की जनहित याचिका पर सुनाया।
खंडपीठ ने राज्य सरकार और निजी स्कूलों की अपीलों को खारिज करते हुए कहा कि यदि कोई स्कूल पहली कक्षा में अतिरिक्त सीटों पर सामान्य प्रवेश देता है, तो उसी अनुपात में 25 प्रतिशत सीटों पर आरटीई से भी प्रवेश देना होगा। मामले में सभी पक्षों की बहस पूरी होने के बाद 4 नवंबर को निर्णय सुरक्षित रखा गया था, जिसे गुरुवार को सुनाया गया।
पीआईएल में राज्य सरकार की वर्ष 2020 की उस अधिसूचना को चुनौती दी गई थी, जिसमें कहा गया था कि निजी स्कूलों को आरटीई के तहत केवल पहली कक्षा में प्रवेश देने पर ही फीस का पुनर्भरण किया जाएगा। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि कई निजी स्कूलों में प्री-प्राइमरी कक्षाएं संचालित होती हैं और वहां पहली कक्षा से पहले ही प्रवेश हो जाता है, जिससे स्कूल आरटीई के तहत प्रवेश नहीं देते। वहीं, स्कूलों की ओर से सीमित संसाधनों का हवाला दिया गया।
राज्य सरकार की ओर से एएजी सुरेन्द्र सिंह नरूका ने दलील दी कि यदि प्री-प्राइमरी स्तर पर भी आरटीई के तहत प्रवेश अनिवार्य किया जाता है, तो केंद्र सरकार से निर्धारित फीस पुनर्भुगतान राशि राज्य को उपलब्ध कराई जानी चाहिए। हालांकि, केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि आरटीई में प्रवेश व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्यों की है। सभी पक्षों को सुनने के बाद खंडपीठ ने विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करते हुए स्कूल संचालकों और राज्य सरकार की अपीलें खारिज कर दीं।