Thursday, 06 August 2026

जेजेएम घोटाला: महेश जोशी समेत सात आरोपियों की जमानत पर हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा


जेजेएम घोटाला: महेश जोशी समेत सात आरोपियों की जमानत पर हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

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हाईकोर्ट मेंबचाव पक्ष ने गिरफ्तारी और जांच प्रक्रिया पर उठाए सवाल, सरकार ने कंपनियों को करोड़ों रुपए का लाभ पहुंचाने के लिए मंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका का आरोप लगाया

जयपुर। जल जीवन मिशन से जुड़े कथित घोटाले में करीब तीन महीने से जेल में बंद पूर्व जलदाय मंत्री महेश जोशी सहित सात आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर बुधवार को राजस्थान हाईकोर्ट में सुनवाई पूरी हो गई। जस्टिस चंद्रप्रकाश श्रीमाली की अदालत ने सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।

मामले में पूर्व मंत्री महेश जोशी, तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिव सुबोध अग्रवाल और अन्य आरोपियों की ओर से गिरफ्तारी तथा जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए। वहीं राज्य सरकार ने आरोप लगाया कि संबंधित कंपनियों को करोड़ों रुपए का अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए मंत्री और वरिष्ठ प्रशासनिक स्तर पर गड़बड़ियां की गईं।

बचाव पक्ष ने भुगतान रोकने का दिया तर्क

आरोपियों की ओर से अदालत में कहा गया कि शिकायत मिलने के बाद और एफआईआर दर्ज होने से पहले ही विभाग ने संबंधित कंपनियों का भुगतान रोक दिया था। कंपनियों को ब्लैकलिस्ट करने की कार्रवाई भी शुरू कर दी गई थी।

बचाव पक्ष का तर्क था कि विभाग ने शिकायत सामने आते ही कार्रवाई की, इसलिए आरोपियों को लगातार हिरासत में रखने की आवश्यकता नहीं है।

सरकार ने अधिकारियों की नियुक्ति में दखल का लगाया आरोप

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता राजेश चौधरी ने जमानत याचिकाओं का विरोध किया। उन्होंने अदालत में आरोप लगाया कि संबंधित कंपनियों के प्रोपराइटर पदमचंद जैन और महेश मित्तल का लोक स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग में इतना प्रभाव था कि वे अपनी पसंद के अधिकारियों की नियुक्ति तक करवाते थे।

सरकार ने एसीबी द्वारा रिकॉर्ड किए गए कथित फोन कॉल का हवाला देते हुए कहा कि दोनों कारोबारियों को 20 जून 2023 को ही यह जानकारी थी कि मामले की जांच के लिए हाईपावर कमेटी किस अधिकारी की अध्यक्षता में गठित होने वाली है।

सरकारी पक्ष ने दावा किया कि चार दिन बाद उसी अधिकारी की अध्यक्षता में समिति गठित कर दी गई। इससे कंपनियों और विभागीय स्तर के अधिकारियों के बीच कथित मिलीभगत का संकेत मिलता है।

14 करोड़ रुपए के भुगतान का मुद्दा

सरकार ने अदालत में कहा कि मामले की जांच के लिए हाईपावर कमेटी गठित किए जाने के बाद भी संबंधित कंपनियों को करीब 14 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया।

अतिरिक्त महाधिवक्ता ने सवाल उठाया कि जब इरकॉन की ओर से आधिकारिक रूप से यह जानकारी मिल चुकी थी कि कंपनियों ने उसके नाम से कथित फर्जी प्रमाण-पत्र तैयार किए हैं, तो उसके बाद अलग से हाईपावर कमेटी गठित करने की क्या आवश्यकता थी।

सरकार ने यह भी आरोप लगाया कि एसीबी की कार्रवाई के बाद ही समिति ने जल्दबाजी में कंपनियों को ब्लैकलिस्ट किया, जबकि उससे पहले कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई थी।

रोहित जोशी की फर्म में रकम पहुंचने का आरोप

राज्य सरकार ने अदालत में दावा किया कि महेश जोशी के करीबी बताए गए संजय बड़ाया के रिश्तेदारों के खातों से करीब 50 लाख रुपए महेश जोशी के बेटे रोहित जोशी की फर्म में स्थानांतरित किए गए।

यह जांच एजेंसी और सरकार का आरोप है। रकम के स्रोत, लेनदेन के उद्देश्य और आरोपियों की भूमिका की अंतिम पुष्टि साक्ष्यों तथा न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।

महेश जोशी ने गिरफ्तारी की जरूरत पर उठाए सवाल

महेश जोशी की ओर से कहा गया कि उनकी गिरफ्तारी आवश्यक नहीं थी। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि ईडी की गिरफ्तारी के बाद वे लगभग सात महीने तक हिरासत में रहे, लेकिन इस दौरान एसीबी ने न तो उनसे पूछताछ की और न ही उन्हें अपने मामले में गिरफ्तार किया।

उनकी ओर से यह भी कहा गया कि एसीबी ने राज्यपाल की आवश्यक मंजूरी मिलने से पहले ही प्रारंभिक जांच शुरू कर दी थी। बचाव पक्ष ने इसे कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन बताया।

‘डिमांड का दस्तावेजी प्रमाण नहीं’

महेश जोशी की ओर से अदालत में कहा गया कि एसीबी के पास किसी तरह की रिश्वत की मांग से जुड़ा दस्तावेजी प्रमाण नहीं है।

बचाव पक्ष ने यह भी दावा किया कि संबंधित फर्जी प्रमाण-पत्रों का उपयोग महेश जोशी के जलदाय मंत्री और सुबोध अग्रवाल के अतिरिक्त मुख्य सचिव बनने से पहले से किया जा रहा था।

140 में से चार टेंडर कार्यकाल में होने का दावा

आरोपियों की ओर से कहा गया कि जल जीवन मिशन के तहत विभाग ने कुल 140 टेंडर जारी किए थे। इनमें से महेश जोशी और सुबोध अग्रवाल के कार्यकाल में केवल चार टेंडर जारी हुए।

बचाव पक्ष ने इस आधार पर पूरे घोटाले की जिम्मेदारी दोनों पर डालने को अनुचित बताया। हालांकि सरकार ने कहा कि जांच में सामने आए दस्तावेज, कॉल रिकॉर्ड और वित्तीय लेनदेन उनकी भूमिका की ओर संकेत करते हैं।

अब हाईकोर्ट के फैसले का इंतजार

दोनों पक्षों की दलीलें पूरी होने के बाद हाईकोर्ट ने जमानत याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया। अदालत अब यह तय करेगी कि आरोपियों को जमानत दी जाए या जांच और आरोपों की गंभीरता को देखते हुए उनकी हिरासत जारी रखी जाए।

जमानत पर निर्णय आरोपों की अंतिम पुष्टि नहीं होगा। मामले में दोषसिद्धि या बरी होने का फैसला विस्तृत सुनवाई, साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।

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