Sunday, 02 August 2026

जयपुर घोषणा-पत्र में शांति मध्यस्थता को विधि के शासन का मूल स्तंभ बनाने का आह्वान


जयपुर घोषणा-पत्र में शांति मध्यस्थता को विधि के शासन का मूल स्तंभ बनाने का आह्वान

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कॉमनवेल्थ के विधिक समुदाय ने संवाद, मेल-मिलाप और न्याय तक समान पहुंच पर आधारित छह सिद्धांत अंगीकृत किए

जयपुर। शांति मध्यस्थता एवं विधि के शासन पर आयोजित कॉमनवेल्थ सम्मेलन में ‘जयपुर घोषणा-पत्र’ अंगीकृत किया गया। घोषणा-पत्र में मध्यस्थता को केवल न्यायालयी प्रक्रिया के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि संवाद, मेल-मिलाप, सामाजिक विश्वास और स्थायी शांति स्थापित करने वाले सार्वभौमिक अनुशासन के रूप में विकसित करने का आह्वान किया गया है।

घोषणा-पत्र में कहा गया है कि शांति, सुरक्षा और सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्व को परिस्थितियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए ऐसी संस्थाओं, विधियों और सामाजिक व्यवहार की आवश्यकता है, जो संघर्षों को उग्र होने से पहले ही संवाद और सहानुभूति के माध्यम से सुलझाने में सक्षम हों।

न्यायिक निर्णय से आगे जाकर मूल संघर्ष के समाधान पर जोर

घोषणा-पत्र के अनुसार प्रत्येक विवाद के पीछे कोई न कोई गहरा संघर्ष होता है, जो न्यायिक निर्णय के बाद भी संबंधों और स्मृतियों में बना रह सकता है। इसलिए वास्तविक समाधान केवल कानूनी दावे का निस्तारण नहीं, बल्कि विश्वास के ह्रास, संबंधों के विघटन और उससे उत्पन्न पीड़ा एवं असमानता को दूर करना भी है।

दस्तावेज में कहा गया है कि शांति मध्यस्थता का लक्ष्य ऐसा अस्थायी समझौता नहीं होना चाहिए, जो अनसुलझे घावों को ढक दे। इसके बजाय ऐसी पारस्परिक समझ विकसित की जानी चाहिए, जो दीर्घकालिक और न्यायपूर्ण सह-अस्तित्व का आधार बने।

मध्यस्थ को संवाद का संरक्षक बताया

घोषणा-पत्र में मध्यस्थ को केवल समझौता कराने वाला सुगमकर्ता नहीं, बल्कि संवाद का संरक्षक और मेल-मिलाप का न्यासी बताया गया है।

मध्यस्थ से अपेक्षा की गई है कि वह ऐसा सुरक्षित और विश्वासपूर्ण वातावरण बनाए, जहां पक्षकार बिना भय के अपनी बात रख सकें, उत्तरदायित्व स्वीकार कर सकें और अपने प्रतिद्वंद्वी माने जाने वाले व्यक्ति या समूह के साथ भी संवाद कर सकें।

मध्यस्थ के लिए स्वतंत्रता, निष्पक्षता, सत्यनिष्ठा, करुणा और सांस्कृतिक संवेदनशीलता को अनिवार्य मूल्य बताया गया है।

मध्यस्थता विधि के शासन का विकल्प नहीं, उसे मजबूत करने का माध्यम

जयपुर घोषणा-पत्र में स्पष्ट किया गया है कि मध्यस्थता विधि के शासन का स्थान नहीं लेती, बल्कि उसे अधिक सुलभ, प्रभावी और विश्वसनीय बनाती है।

दस्तावेज में कहा गया है कि कोई भी मध्यस्थतापूर्ण समाधान दबाव, भय, बल या मानवीय गरिमा के त्याग को वैधता नहीं दे सकता। प्रभावित पक्षों की स्वतंत्र और सूचित सहमति को मध्यस्थता का बुनियादी आधार माना गया है।

घोषणा-पत्र ने सिंगापुर मध्यस्थता अभिसमय की भावना को वाणिज्यिक विवादों से आगे बढ़ाकर सामुदायिक, पर्यावरणीय, संस्थागत और सीमा-पार संघर्षों तक विस्तारित करने की प्रतिबद्धता जताई है।

प्रत्येक व्यक्ति को समान पहुंच देने की बात

घोषणा-पत्र में कहा गया है कि मध्यस्थता धन, प्रभाव या सत्ता का विशेषाधिकार नहीं हो सकती। वंचित, दिव्यांग, आर्थिक रूप से कमजोर और विस्थापित व्यक्तियों को भी शांति मध्यस्थता तक समान और प्रभावी पहुंच मिलनी चाहिए।

इसके साथ ही पर्यावरण संरक्षण, भावी पीढ़ियों के हित और उभरती तकनीकों के जिम्मेदार उपयोग को भी मध्यस्थता की व्यापक जिम्मेदारी से जोड़ा गया है।

दस्तावेज में ऐसे मध्यस्थ तैयार करने की आवश्यकता बताई गई है, जो कानून के साथ सहानुभूति, पर्यावरणीय चेतना और लोकहित की समझ में भी दक्ष हों।

महिला मध्यस्थों की सार्थक भागीदारी पर जोर

घोषणा-पत्र में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1325 के अनुरूप शांति मध्यस्थता की प्रत्येक प्रक्रिया में महिलाओं की पूर्ण और सार्थक भागीदारी को जरूरी बताया गया है।

इसमें कॉमनवेल्थ की महिला मध्यस्थों के योगदान का स्वागत करते हुए विधिक समुदाय से यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि मध्यस्थता प्रक्रिया उन समुदायों की विविधता और समावेशिता का वास्तविक प्रतिनिधित्व करे, जिनकी वह सेवा करती है।

भारत के मध्यस्थता अधिनियम-2023 को बताया अनुकरणीय मॉडल

दस्तावेज में भारत के मध्यस्थता अधिनियम-2023 और सर्वोच्च न्यायालय के संरक्षण में संचालित ‘मेडिएशन फॉर द नेशन’ अभियान का उल्लेख करते हुए उन्हें कॉमनवेल्थ और वैश्विक दक्षिण के लिए अनुकरणीय मॉडल बताया गया है।

घोषणा-पत्र में कहा गया है कि इन पहलों ने यह दिखाया है कि मध्यस्थता को न्याय व्यवस्था का विश्वसनीय, सुलभ और प्राथमिक अंग कैसे बनाया जा सकता है।

छह प्रमुख सिद्धांत किए गए घोषित

जयपुर घोषणा-पत्र में छह प्रमुख सिद्धांत शामिल किए गए हैं—

पहला: शांति के प्रति साझा प्रतिबद्धता और संवाद को प्रभुत्व से ऊपर रखना।
दूसरा: केवल विवाद नहीं बल्कि उसके मूल संघर्ष का समाधान करना।
तीसरा: मध्यस्थ को संवाद के संरक्षक और मेल-मिलाप के न्यासी के रूप में स्वीकार करना।
चौथा: मध्यस्थता को न्याय, विधि और शांति की संरचना का मूल स्तंभ बनाना।
पांचवां: प्रत्येक व्यक्ति के लिए मध्यस्थता तक समान और प्रभावी पहुंच सुनिश्चित करना।
छठा:
घोषणा-पत्र को एक जीवंत संकल्प मानते हुए उसके क्रियान्वयन की नियमित समीक्षा करना।

‘जयपुर की भावना’ के तहत प्रगति की समीक्षा का संकल्प

घोषणा-पत्र में कहा गया है कि यह दस्तावेज किसी प्रक्रिया का समापन नहीं, बल्कि नई यात्रा का प्रारंभ है।

प्रतिनिधियों ने ‘जयपुर की भावना’ के अनुरूप समय-समय पर पुनः एकत्र होकर घोषणा-पत्र के क्रियान्वयन की समीक्षा करने और इसकी प्रगति से कॉमनवेल्थ लॉयर्स एसोसिएशन तथा व्यापक राष्ट्रमंडल समुदाय को अवगत कराने का संकल्प लिया।

दस्तावेज को भावी पीढ़ियों को इस विश्वास के साथ समर्पित किया गया है कि न्याय संस्थाओं का उद्देश्य केवल विवादों का निर्णय करना नहीं, बल्कि संघर्षों का स्थायी, न्यायपूर्ण और मानवीय समाधान सुनिश्चित करना भी होना चाहिए।

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