



जयपुर। अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ, राजस्थान (विद्यालय शिक्षा), जयपुर प्रथम की ओर से गुरु पूर्णिमा के अवसर पर वर्धमान इंटरनेशनल स्कूल, जयपुर के सभागार में ‘गुरु वंदन कार्यक्रम’ का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत प्रचारक बाबूलाल ने कहा कि “गुरु का संकल्प ही दुनिया बदलता आया है।” उन्होंने कहा कि यदि आर्य समाज का योगदान नहीं होता तो भारत में वेदों का अस्तित्व संकट में पड़ सकता था। मूलशंकर को महर्षि दयानंद सरस्वती बनाने का श्रेय उनके गुरु स्वामी विरजानंद को जाता है।
उन्होंने कहा कि शिक्षक, टीचर अथवा मास्टर बनना अपेक्षाकृत सरल हो सकता है, लेकिन गुरु बनना अत्यंत कठिन है। गुरु वही है, जो राष्ट्र के आगामी पांच सौ वर्षों के भविष्य को देख सके और अपने दर्शन, संस्कार तथा संकल्प के अनुरूप उसे सही दिशा देने की क्षमता रखता हो।
बाबूलाल ने इतिहास के उदाहरण देते हुए कहा कि हारित ऋषि ने बप्पा रावल, गुरु विद्यारण्य ने विजयनगर साम्राज्य के संस्थापक हरिहर और बुक्का तथा समर्थ गुरु रामदास ने छत्रपति शिवाजी के माध्यम से राष्ट्र के भविष्य को नई दिशा प्रदान की।
उन्होंने कहा कि गुरु केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की भावी दिशा निर्धारित करने वाला मार्गदर्शक होता है। गुरुओं के संकल्प और संस्कारों से ही समर्थ, चरित्रवान और राष्ट्रनिष्ठ पीढ़ियों का निर्माण होता है।
बाबूलाल ने कहा कि आज देश के लिए सबसे बड़ा खतरा केवल बाहरी सीमाओं से नहीं, बल्कि शक्तिहीन और बिखरते परिवारों से भी उत्पन्न हो रहा है। उन्होंने कहा कि बाल-संकट और अविवाहित लोगों की बढ़ती संख्या के कारण जनसांख्यिकीय संतुलन प्रभावित हो रहा है।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार एक समय जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण को आवश्यक माना गया था, उसी प्रकार वर्तमान परिस्थितियों में जनसंख्या स्थिरीकरण भी महत्वपूर्ण विषय बन गया है। उन्होंने नागरिक शिष्टाचार की पुनर्स्थापना का दायित्व शिक्षक समाज पर बताते हुए कहा कि राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. नंदकिशोर पाण्डेय ने कहा कि महर्षि वेदव्यास वैदिक संस्कृति के महान व्याख्याता थे। उन्होंने वेदों को चार भागों में विभाजित किया और पुराणों का संकलन किया। उनके सम्मान में ही व्यास पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।
भारतीय संस्कृति और संस्कृत शिक्षण की परंपरा पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि आज भी देश में लगभग 50 लाख पांडुलिपियां अप्रकाशित हैं। इन पांडुलिपियों को विपरीत परिस्थितियों में हमारे पूर्वज गुरुओं ने सुरक्षित रखा।
उन्होंने कहा कि मातृभाषा में प्राप्त शिक्षा ही व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करती है, जबकि विदेशी भाषाओं का ज्ञान अपेक्षाकृत कम समय में भी अर्जित किया जा सकता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ, राजस्थान (विद्यालय शिक्षा) के प्रदेशाध्यक्ष रमेशचंद पुष्करणा ने संगठन के बहुआयामी उद्देश्यों की जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि यह शिक्षकों का ऐसा संगठन है, जो सनातन परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए निरंतर कार्य कर रहा है। लगभग 2 लाख 80 हजार सदस्यों के साथ यह प्रदेश का सबसे बड़ा शिक्षक संगठन है।
पुष्करणा ने बताया कि संगठन गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण के माध्यम से संस्कारित पीढ़ी के निर्माण की दिशा में कार्यरत है। राज्य स्तर पर प्रभावी प्रार्थना सभा का प्रशिक्षण आयोजित किया जा चुका है। इसके साथ ही ‘हमारा विद्यालय, हमारा तीर्थ’ अभियान के अंतर्गत हनुमान सिंह द्वारा लिखित पुस्तक की 1 करोड़ 36 लाख प्रतियां वितरित की जाएंगी।
कार्यक्रम के अंत में जयपुर प्रथम के जिलाध्यक्ष केशवराज चौहान ने आयोजन में सहयोग देने वाले सभी अतिथियों, पदाधिकारियों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन प्रदेश अतिरिक्त महामंत्री बसंत जिंदल ने किया।