



एक्सप्रेसवे और हाईवे अरबों रुपए की परियोजनाओं के बावजूद सड़कों में गड्ढे और धंसाव, जवाबदेही तय करने की उठी मांग
नई दिल्ली। देश में अरबों रुपए की लागत से बन रहे एक्सप्रेसवे और राष्ट्रीय राजमार्गों की गुणवत्ता पर पहली बरसात ने ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कई स्थानों से नए बने या हाल ही में शुरू हुए एक्सप्रेसवे, हाईवे, पुलों और सड़कों के क्षतिग्रस्त होने, धंसने और गड्ढे बनने की तस्वीरें सामने आ रही हैं। इन घटनाओं ने सड़क निर्माण में गुणवत्ता, निगरानी और जवाबदेही को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2017 में संसद में कहा था कि सड़क निर्माण में स्पेस टेक्नोलॉजी का उपयोग किया जा रहा है और सैटेलाइट आधारित फोटोग्राफी व मॉनिटरिंग से कार्यों की निगरानी होती है। वहीं केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने भी भारत में विश्वस्तरीय सड़क नेटवर्क विकसित करने की बात कही थी। ऐसे में यदि पहली या शुरुआती बरसात में ही बड़े राजमार्ग और एक्सप्रेसवे क्षतिग्रस्त होते हैं, तो यह केवल तकनीकी खामी नहीं, बल्कि निगरानी व्यवस्था की विफलता का भी संकेत माना जा रहा है।
हाल के दिनों में दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे, दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे, सूरत, रीवा-सतना हाईवे, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे और बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे जैसे मार्गों से सड़क धंसने, गड्ढे बनने या निर्माण गुणवत्ता पर सवाल उठने की खबरें और वीडियो सामने आए हैं। कई स्थानों पर पुलों के एक्सपेंशन जॉइंट, सड़क की सतह और ड्रेनेज व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे हैं। इन दावों और घटनाओं की तकनीकी जांच कर वास्तविक कारणों को सार्वजनिक किया जाना आवश्यक है।
सबसे गंभीर चिंता यह है कि एक्सप्रेसवे और हाईवे पर वाहन सामान्य सड़कों की तुलना में कहीं अधिक गति से चलते हैं। ऐसे में सड़क पर अचानक बने गड्ढे, धंसी हुई सतह या पुल के जोड़ में खामी किसी भी बड़े हादसे का कारण बन सकती है। सड़क सुरक्षा केवल यातायात नियमों का विषय नहीं है, बल्कि निर्माण गुणवत्ता और रखरखाव से भी सीधे जुड़ी हुई है।
बड़ी सड़क परियोजनाओं के निर्माण और रखरखाव की जिम्मेदारी भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय से जुड़ी व्यवस्थाओं पर होती है। यदि हजारों करोड़ रुपए की परियोजनाएं शुरुआती बरसात में ही प्रभावित हो रही हैं, तो यह जांच का विषय है कि खामी डिजाइन में है, निर्माण सामग्री में है, ठेकेदार के कार्य में है या निगरानी प्रणाली में।
देश में सामान्यतः सड़क टूटने पर स्थानीय इंजीनियरों, अधिकारियों या ठेकेदारों पर कार्रवाई कर दी जाती है। कई बार ठेकेदारों को अस्थायी रूप से ब्लैकलिस्ट कर दिया जाता है और कुछ अधिकारियों को निलंबित कर मामला शांत कर दिया जाता है। लेकिन बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में केवल निचले स्तर की कार्रवाई पर्याप्त नहीं हो सकती। ऐसी परियोजनाओं में मंजूरी, डिजाइन, सुपरविजन, गुणवत्ता परीक्षण, थर्ड पार्टी ऑडिट और भुगतान प्रक्रिया से जुड़े सभी स्तरों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
सवाल यह भी है कि यदि सड़कों के निर्माण में आधुनिक तकनीक, सैटेलाइट मॉनिटरिंग, ड्रोन सर्वे, थर्ड पार्टी इंस्पेक्शन और डिजिटल रिपोर्टिंग का दावा किया जाता है, तो फिर गुणवत्ता की कमियां समय रहते क्यों नहीं पकड़ी जातीं। यदि निगरानी तंत्र मौजूद है, तो वह प्रभावी क्यों नहीं है और यदि प्रभावी है, तो दोषी कौन है—यह स्पष्ट होना चाहिए।
सड़क, पुल, एयरपोर्ट और सार्वजनिक भवन जैसे बड़े निर्माण केवल सरकारी उपलब्धियां नहीं होते, बल्कि जनता के पैसों से तैयार राष्ट्रीय संपत्ति होते हैं। इनकी गुणवत्ता से आम नागरिकों की सुरक्षा, समय, अर्थव्यवस्था और भरोसा जुड़ा होता है। इसलिए किसी भी एक्सप्रेसवे या हाईवे के क्षतिग्रस्त होने को केवल बारिश या प्राकृतिक कारणों पर डालकर टाला नहीं जा सकता।
केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को आमतौर पर इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में सक्रिय और परिणामोन्मुख मंत्री के रूप में देखा जाता है। ऐसे में मंत्रालय की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है कि निर्माण गुणवत्ता पर सख्त निगरानी रखी जाए और जहां भी गड़बड़ी हो, वहां पारदर्शी जांच कर दोषियों पर कठोर कार्रवाई की जाए। केवल मरम्मत कर देना पर्याप्त नहीं है; जनता यह जानना चाहती है कि पहली बरसात में सड़क क्यों टूटी और किस स्तर पर लापरवाही हुई।
डबल इंजन सरकार और तेज विकास के दावों के बीच सड़कों की गुणवत्ता का प्रश्न सीधे शासन की विश्वसनीयता से जुड़ता है। यदि एक्सप्रेसवे और हाईवे जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स टिकाऊ नहीं हैं, तो विकास मॉडल पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। सरकारों को चाहिए कि सभी हालिया क्षतिग्रस्त सड़क परियोजनाओं का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कराया जाए, रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए और दोषियों के विरुद्ध समयबद्ध कार्रवाई हो।
आखिरकार, सवाल केवल सड़क के गड्ढों का नहीं है। सवाल जनता के धन, यात्रियों की सुरक्षा और सरकारी दावों की विश्वसनीयता का है। अरबों रुपए की परियोजनाएं यदि पहली बरसात में ही जवाब देने लगें, तो यह व्यवस्था से गंभीर आत्ममंथन की मांग करता है।