



एफआर के बाद प्रोटेस्ट पिटीशन पर लिया गया था प्रसंज्ञान, बचाव पक्ष ने एफआईआर में देरी और बयानों के विरोधाभासों को बनाया मुख्य आधार
जयपुर। पोक्सो एक्ट से जुड़े एक मामले में विशेष न्यायालय क्रम संख्या-3, जयपुर महानगर ने आरोपी शिक्षक को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया। मामले में पीड़िता की माता की ओर से रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी कि स्कूल परिसर में आरोपी ने पीड़िता के साथ अनुचित व्यवहार किया और उसके शरीर को गलत तरीके से छुआ। आरोप था कि घटना के बाद पीड़िता ने इसकी जानकारी स्कूल के एक शिक्षक को दी, लेकिन उसे घर जाने और कुछ दिन कोचिंग नहीं आने की बात कही गई।
रिपोर्ट के अनुसार, पीड़िता का कहना था कि वह आरोपी से स्वयं को छुड़ाकर भागी, इसी दौरान सीढ़ियों पर गिरने से उसे चोट आई। घर पहुंचने के बाद उसकी माता ने उपचार कराया और बाद में पीड़िता ने रोते हुए पूरी घटना बताई। इसके बाद पीड़िता की माता ने आरोपी से फोन पर बात करने तथा उसके माफी मांगने की बात कही और दो दिन बाद पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई।
पुलिस ने मामले की जांच के बाद आरोप प्रमाणित नहीं पाए और प्रकरण में एफआर प्रस्तुत कर दी। आरोपी रामावतार की ओर से कहा गया कि वह स्कूल में प्रिंसिपल नहीं, बल्कि शिक्षक है और मैनेजमेंट संबंधी कार्य देखता है। आरोपी ने अपने बचाव में यह भी कहा कि घटना से कुछ दिन पूर्व स्कूल के बाहर खड़े कुछ लड़कों को उसने फटकार लगाई थी। उसके अनुसार, वे लड़के पीड़िता से मिलने आए थे और इसी बात को लेकर विवाद की स्थिति बनी थी।
पुलिस जांच के दौरान पीड़िता के धारा 164 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान दर्ज कराए गए। जांच के बाद पुलिस ने मामला प्रमाणित नहीं माना और एफआर पेश की। हालांकि, प्रोटेस्ट पिटीशन पेश होने के बाद पोक्सो कोर्ट ने पीड़िता के शपथपूर्वक बयान दर्ज कर प्रसंज्ञान लिया और आरोपी को न्यायालय में तलब किया। आरोपी के न्यायालय में सरेंडर करने पर उसे न्यायिक हिरासत में भेजा गया। वह करीब चार माह जेल में रहा और बाद में माननीय राजस्थान हाईकोर्ट से उसे जमानत मिली।
इसके पश्चात न्यायालय ने आरोपी के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 354 तथा पोक्सो एक्ट की धारा 7/8 के तहत आरोप तय किए। अभियोजन पक्ष की ओर से पीड़िता, उसकी माता और अन्य गवाहों के बयान दर्ज कराए गए। आरोपी को बचाव साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया। आरोपी की ओर से यह प्रार्थना पत्र पेश किया गया कि प्रकरण में जिन स्वतंत्र गवाहों के बयान नहीं करवाए गए हैं, उन्हें न्यायालय तलब कर बयान दर्ज करे। हालांकि, न्यायालय ने प्रार्थना पत्र खारिज करते हुए कहा कि आरोपी अपने खर्चे पर उन्हें बचाव साक्ष्य में तलब कर सकता है।
अंतिम बहस के दौरान बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता पूनम चंद भंडारी, पंकज गुलाटी और फरहान जैदी ने न्यायालय के समक्ष तर्क रखा कि प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने में दो दिन की देरी हुई, जो अभियोजन कहानी पर संदेह उत्पन्न करती है। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि जिस स्कूल में पीड़िता पढ़ती थी, वहां की प्रिंसिपल द्वारा भी मामले की आंतरिक जांच की गई थी और छात्रों-छात्राओं के बयान लेने के बाद ऐसी घटना होना प्रमाणित नहीं पाया गया।
बचाव पक्ष की ओर से यह भी कहा गया कि पीड़िता ने उन सहेलियों के बयान दर्ज नहीं करवाए, जिन्हें उसने घटना के समय मौके पर होना बताया था। इसके अतिरिक्त धारा 164 के बयान दर्ज करने वाले मजिस्ट्रेट के बयान भी अभियोजन की ओर से नहीं करवाए गए। बचाव पक्ष ने पीड़िता के पुलिस बयान, धारा 164 के बयान और न्यायालय में दिए गए बयान में विरोधाभास होने का तर्क भी रखा।
बचाव पक्ष ने पीड़िता की आयु को लेकर भी सवाल उठाया। जन्मतिथि के आधार पर पीड़िता की आयु लगभग 16 वर्ष 7 माह बताई गई, जबकि जिरह के दौरान विभिन्न स्कूलों में अध्ययन संबंधी तथ्यों के आधार पर बचाव पक्ष ने उसकी आयु अधिक होने का तर्क दिया। हालांकि, न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
विशेष न्यायालय क्रम संख्या-3, जयपुर महानगर ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद पाया कि अभियोजन आरोपी के विरुद्ध आरोप संदेह से परे सिद्ध करने में सफल नहीं हो पाया। न्यायालय ने साक्ष्य के अभाव और अभियोजन पक्ष की कहानी में मौजूद कमियों को देखते हुए आरोपी को बरी कर दिया।