Friday, 03 July 2026

राजस्थान में एपीओ की अवधि अब 30 दिन से ज्यादा नहीं, नियम तोड़ने पर अफसर होंगे जवाबदेह


राजस्थान में एपीओ की अवधि अब 30 दिन से ज्यादा नहीं, नियम तोड़ने पर अफसर होंगे जवाबदेह

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वित्त विभाग ने जारी की नई गाइडलाइन, पदस्थापन की प्रतीक्षा में रखकर नियुक्ति लटकाने की प्रवृत्ति पर लगेगी रोक

जयपुर। राजस्थान में सरकारी अधिकारी-कर्मचारियों को लंबे समय तक एपीओ रखकर पदस्थापन लटकाने की व्यवस्था पर अब सख्ती की गई है। वित्त विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि पदस्थापन की प्रतीक्षा यानी एपीओ की अवधि सामान्य परिस्थितियों में 30 दिन से अधिक नहीं होगी। यदि किसी मामले में 30 दिन से अधिक अवधि तक एपीओ रखना आवश्यक हो, तो इसके लिए ठोस कारणों सहित वित्त विभाग से पूर्व स्वीकृति लेनी होगी।

वित्त विभाग की ओर से यह नई गाइडलाइन विशेष सचिव शिवांगी स्वर्णकार द्वारा राजस्थान सेवा नियम, 1951 के नियम 25-ए के तहत जारी की गई है। सरकार ने माना है कि पूर्व में वर्ष 1981, 1984 और 2007 में जारी आदेशों की प्रभावी पालना नहीं हो रही थी। कई मामलों में नियम विरुद्ध एपीओ आदेश हाईकोर्ट में चुनौती के बाद निरस्त भी हो रहे थे। इसी स्थिति को देखते हुए अब विभागों और अधिकारियों की जवाबदेही तय करने का निर्णय लिया गया है।

नई गाइडलाइन के अनुसार, एपीओ को सजा या अनुशासनात्मक कार्रवाई के विकल्प के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा। यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी को एपीओ किया जाता है, तो उसके कारण स्पष्ट रूप से बताना आवश्यक होगा। इससे एपीओ व्यवस्था के मनमाने उपयोग पर रोक लगेगी और अधिकारी-कर्मचारियों को अनिश्चितता की स्थिति में लंबे समय तक नहीं रखा जा सकेगा।

गाइडलाइन में यह भी प्रावधान किया गया है कि अवकाश स्वीकृत करते समय ही संबंधित अधिकारी या कर्मचारी के आगामी पदस्थापन स्थान का उल्लेख करना होगा। अवकाश समाप्त होने से पहले पदस्थापन आदेश जारी करना अनिवार्य होगा, ताकि कर्मचारी को ज्वॉइनिंग में अनावश्यक परेशानी न हो।

इसी प्रकार प्रतिनियुक्ति या प्रशिक्षण से लौटने वाले अधिकारी-कर्मचारियों के लिए भी स्पष्ट व्यवस्था की गई है। ऐसे मामलों में वापसी से 15 दिन पहले ही पदस्थापन आदेश जारी किए जाएंगे। इससे प्रतिनियुक्ति या प्रशिक्षण के बाद लंबे समय तक पदस्थापन की प्रतीक्षा में रहने की स्थिति समाप्त होगी।

तबादले के मामलों में भी नई गाइडलाइन महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अब तबादले के बाद ज्वॉइनिंग से रोकने की प्रवृत्ति पर नियंत्रण होगा। विभागों को समय पर पदस्थापन आदेश जारी करने होंगे और किसी भी अधिकारी या कर्मचारी को अनावश्यक रूप से एपीओ स्थिति में नहीं रखा जा सकेगा।

मुख्य सचिव स्तर पर भी एपीओ मामलों की निगरानी की जाएगी। मुख्य सचिव हर तिमाही एपीओ मामलों की समीक्षा करेंगे और इसकी रिपोर्ट सीएमआईएस पोर्टल पर अपलोड की जाएगी। इससे एपीओ मामलों में पारदर्शिता बढ़ेगी और विभागीय स्तर पर लंबित मामलों की नियमित निगरानी हो सकेगी।

गत 24 जून को जारी सर्कुलर के बिंदु संख्या 7 में स्पष्ट किया गया है कि एपीओ की अवधि 30 दिन से अधिक नहीं होगी। यदि किसी विभाग को अवधि बढ़ानी है, तो उसे ठोस कारणों के साथ वित्त विभाग से पहले मंजूरी लेनी होगी। इसके साथ निर्धारित चेक लिस्ट भी संलग्न करनी होगी।

यदि 30 दिन के भीतर पदस्थापन आदेश जारी नहीं होते हैं, तो संबंधित विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव या प्रमुख सचिव को हर महीने मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव को डीओ लेटर के माध्यम से रिपोर्ट भेजनी होगी। इस रिपोर्ट में संबंधित अधिकारी या कर्मचारी का नाम, पद और एपीओ की कुल अवधि का स्पष्ट उल्लेख करना होगा।

सरकार की इस पहल से राज्य पर अनावश्यक वित्तीय भार कम होने की उम्मीद है। लंबे समय तक एपीओ रहने के बावजूद वेतन और अन्य देयकों का भुगतान होता रहता है, जबकि संबंधित अधिकारी या कर्मचारी से नियमित कार्य नहीं लिया जा पाता। अब समयबद्ध पदस्थापन से प्रशासनिक दक्षता बढ़ेगी और वित्तीय अनुशासन भी मजबूत होगा।

कर्मचारी संगठनों की भी लंबे समय से मांग थी कि एपीओ व्यवस्था के नाम पर होने वाले शोषण और मनमानी पर रोक लगाई जाए। नई गाइडलाइन में 30 दिन की समय-सीमा, वित्त विभाग की पूर्व स्वीकृति और मुख्य सचिव स्तर की समीक्षा जैसे प्रावधानों से विभागीय अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी। इसे सरकारी कार्मिकों के हित में महत्वपूर्ण प्रशासनिक सुधार माना जा रहा है।

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