



31 जुलाई तक चुनाव कराने के हाईकोर्ट आदेश की पालना नहीं होने का आरोप, राज्य निर्वाचन आयोग और अधिकारियों को नोटिस
जयपुर। राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनावों को लेकर कानूनी और राजनीतिक विवाद तेज होता जा रहा है। पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने 31 जुलाई 2026 तक पंचायत-निकाय चुनाव कराने के अदालती आदेश की पालना में चुनाव प्रक्रिया शुरू नहीं होने को लेकर अवमानना की तैयारी शुरू कर दी है। इसी क्रम में उनकी ओर से बुधवार को राज्य निर्वाचन आयुक्त राजेश्वर सिंह, आयोग सचिव राजेश वर्मा, पंचायती राज सचिव जोगाराम और स्थानीय निकाय निदेशक जुइकर प्रतीक चंद्रशेखर को लीगल नोटिस भेजा गया है।
अधिवक्ता पुनीत सिंघवी की ओर से भेजे गए नोटिस में कहा गया है कि राजस्थान हाईकोर्ट पंचायत और निकाय चुनावों को लेकर स्पष्ट निर्देश दे चुका है। इसके बावजूद 31 जुलाई तक चुनाव कराने के लिए आवश्यक चुनावी प्रक्रिया प्रभावी रूप से शुरू नहीं की गई है। नोटिस में इसे अदालत के आदेश की अवहेलना बताते हुए कहा गया है कि यदि समयबद्ध कार्रवाई नहीं की गई तो अवमानना कार्यवाही की जाएगी।
राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनावों को लेकर लंबे समय से असमंजस की स्थिति बनी हुई है। हाईकोर्ट ने पहले पंचायत-निकाय चुनाव 15 अप्रैल तक कराने की समयसीमा तय की थी। इसके बाद राज्य सरकार की ओर से समय बढ़ाने का आग्रह किया गया, जिस पर अदालत ने राहत देते हुए 31 जुलाई 2026 तक चुनाव कराने की नई समयसीमा निर्धारित की। अब इस समयसीमा के समाप्त होने में मात्र 29 दिन शेष बताए जा रहे हैं, लेकिन चुनावी प्रक्रिया अभी शुरुआती स्तर पर ही दिखाई दे रही है।
इधर, अन्य पिछड़ा वर्ग राजनीतिक प्रतिनिधित्व आयोग पंचायत और निकाय चुनावों के लिए ओबीसी परिवारों का सर्वे शुरू कराने की तैयारी कर रहा है। जानकारी के अनुसार, यह सर्वे 8 जुलाई से शुरू कर 20 जुलाई तक पूरा कराने की योजना है। हालांकि, चुनावी प्रक्रिया की समयसीमा और ओबीसी सर्वे को लेकर प्रशासनिक स्तर पर स्थिति स्पष्ट नहीं होने से विवाद और गहराता जा रहा है।
एक ओर ओबीसी राजनीतिक प्रतिनिधित्व आयोग सर्वे की तैयारी कर रहा है, वहीं आयोग से जुड़े मानदेय और बजट को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। बताया जा रहा है कि ओबीसी आयोग की संयुक्त सचिव अंजू पारीक ने आयोग के अध्यक्ष, सदस्य सचिव और सदस्यों के मानदेय के लिए बजट जारी नहीं किया है। ऐसे में सर्वे और चुनावी तैयारियों की गति को लेकर भी संशय बना हुआ है।
पंचायत और निकाय चुनावों को लेकर राज्य में राजनीतिक विवाद भी लगातार बढ़ रहा है। बीते दिनों राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी द्वारा चुनाव अक्टूबर से दिसंबर के बीच कराए जाने संबंधी बयान पर पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने कड़ी आपत्ति जताई थी। उन्होंने इसे हाईकोर्ट के आदेश की अवमानना बताया था। भीलवाड़ा में 15 जून को मीडिया से बातचीत में अरुण चतुर्वेदी ने कहा था कि ‘एक राज्य, एक चुनाव’ के संकल्प के तहत राज्य सरकार अक्टूबर से दिसंबर के बीच हर हाल में पंचायत और निकाय चुनाव करा लेगी।
पूर्व मुख्य सचिव एवं पूर्व राज्य निर्वाचन आयुक्त इंद्रजीत खन्ना के बयान ने भी इस मामले को संवैधानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बना दिया है। उनके अनुसार, पंचायत और निकाय चुनाव समय पर नहीं होना अपने आप में असंवैधानिक स्थिति है। उन्होंने कहा था कि असमंजस समाप्त करने के लिए अदालत को संवैधानिक प्रावधानों की पालना सुनिश्चित करानी चाहिए।
अब संयम लोढ़ा की ओर से लीगल नोटिस भेजे जाने के बाद मामला एक बार फिर कानूनी मोड़ पर पहुंच गया है। यदि निर्धारित समयसीमा के भीतर चुनाव प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती है, तो अवमानना याचिका दाखिल होने की संभावना बन सकती है। ऐसे में राज्य निर्वाचन आयोग, राज्य सरकार और संबंधित विभागों पर समयबद्ध निर्णय लेने का दबाव बढ़ गया है।
राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनाव केवल राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि स्थानीय स्वशासन और संवैधानिक व्यवस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। गांवों, नगरपालिकाओं और नगर निकायों में निर्वाचित प्रतिनिधियों के अभाव से स्थानीय विकास, प्रशासनिक जवाबदेही और जनप्रतिनिधित्व प्रभावित होता है। इसलिए 31 जुलाई की समयसीमा को लेकर अब सबकी नजर राज्य सरकार, निर्वाचन आयोग और न्यायालय की अगली कार्यवाही पर टिकी है।