Monday, 15 June 2026

टीएमसी में बड़ी टूट, 20 लोकसभा सांसदों ने एनसीपीआई में विलय का ऐलान, एनडीए को समर्थन देने की घोषणा


टीएमसी में बड़ी टूट, 20 लोकसभा सांसदों ने एनसीपीआई में विलय का ऐलान, एनडीए को समर्थन देने की घोषणा

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पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। पार्टी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने रविवार को नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय की घोषणा कर दी। बागी सांसदों की ओर से सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र सौंपने के बाद इस फैसले का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि उनका समूह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के साथ मिलकर काम करेगा।

नई दिल्ली में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात के बाद काकोली घोष दस्तीदार ने कहा कि दो-तिहाई से अधिक सांसदों का समर्थन उनके साथ है और उन्होंने अलग पहचान तथा बैठने की व्यवस्था की मांग की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सांसदों का समूह एनसीपीआई में विलय कर चुका है और आगे एनडीए के साथ सहयोग करेगा।

वरिष्ठ सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय और शताब्दी रॉय ने भी पुष्टि की कि बागी गुट पहले ही एनसीपीआई में शामिल हो चुका है। बताया जा रहा है कि लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात से पहले बागी सांसदों ने केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता भूपेंद्र यादव के साथ भी बैठक की थी।

इस राजनीतिक घटनाक्रम के बाद कोलकाता में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आवास पर पार्टी की आपात बैठक बुलाई गई। बैठक में अभिषेक बनर्जी, कल्याण बनर्जी सहित टीएमसी के कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए। पार्टी नेतृत्व इस घटनाक्रम के राजनीतिक और कानूनी पहलुओं पर मंथन कर रहा है।

बागी सांसदों का यह कदम संसद की राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है। 20 सांसदों के शामिल होने से एनसीपीआई का आकार अचानक बढ़ गया है और वह लोकसभा में प्रमुख दलों में शामिल हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे पश्चिम बंगाल की राजनीति के साथ-साथ संसद में विपक्ष और सत्तापक्ष के समीकरणों पर भी असर पड़ सकता है।

हालांकि टीएमसी नेतृत्व ने इस कदम का विरोध किया है। पार्टी की ओर से लोकसभा अध्यक्ष को पत्र भेजकर किसी भी बागी गुट को अलग मान्यता नहीं देने का अनुरोध किया गया है। टीएमसी का तर्क है कि संविधान और दल-बदल विरोधी कानून के तहत पार्टी को विभाजित नहीं माना जा सकता और अंतिम निर्णय संवैधानिक प्रक्रिया के तहत ही होगा।

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