



राजस्थान सरकार द्वारा आबकारी विभाग की सामान्य शाखा और निरोधक दल शाखा के प्रस्तावित एकीकरण को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। 1 जून 2026 को जारी आदेश के तहत दोनों शाखाओं के विलय की प्रक्रिया शुरू की गई थी, लेकिन इस निर्णय को चुनौती देते हुए राजस्थान आबकारी सेवा संघ ने राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति चंद्र प्रकाश श्रीमाली की एकल पीठ ने एकीकरण प्रक्रिया पर अंतरिम स्थगन आदेश जारी किया है। इसके बाद यह मुद्दा केवल विभागीय पुनर्गठन तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि सेवा संरचना, पदोन्नति, भर्ती प्रक्रिया और प्रशासनिक औचित्य से जुड़ी व्यापक बहस का विषय बन गया है।
विवाद का प्रमुख आधार दोनों संवर्गों की वेतनमान और सेवा संरचना में मौजूद अंतर को माना जा रहा है। जानकारी के अनुसार वर्ष 2009 से पूर्व आबकारी निरोधक दल के प्रहराधिकारी संवर्ग का ग्रेड पे 2100 रुपये था, जिसे बाद में बढ़ाकर 2400 रुपये और फिर 3600 रुपये कर दिया गया। दूसरी ओर आबकारी निरीक्षक संवर्ग का ग्रेड पे लंबे समय से 3600 रुपये पर बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल समान ग्रेड पे होने से दो अलग-अलग संवर्गों की योग्यता, चयन प्रक्रिया, जिम्मेदारियां और प्रशासनिक स्थिति स्वतः समान नहीं हो जाती। इसी कारण एकीकरण के औचित्य पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
पदोन्नति व्यवस्था को लेकर भी गंभीर आपत्तियां सामने आई हैं। विभागीय आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2012 में निरोधक दल के जमादार द्वितीय श्रेणी स्तर पर कार्यरत कार्मिकों को चार से पांच पदोन्नतियां प्राप्त हो चुकी हैं और वे आबकारी अधिकारी से लेकर संभागीय स्तर के डिप्टी कमिश्नर पदों तक पहुंच चुके हैं। इसके विपरीत उसी अवधि में सामान्य शाखा के कई आबकारी निरीक्षक द्वितीय श्रेणी अधिकारी केवल निरीक्षक प्रथम श्रेणी तक ही पहुंच पाए हैं। आलोचकों का तर्क है कि दोनों संवर्गों की पदोन्नति संरचना और कैरियर प्रगति में इतना बड़ा अंतर होने के बावजूद उन्हें समान स्तर पर रखना सेवा न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू भर्ती प्रक्रिया से भी जुड़ा है। सामान्य शाखा के अधिकारियों का चयन राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित राजस्थान प्रशासनिक सेवा (आरएएस) संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से किया जाता है, जहां न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता स्नातक निर्धारित है। वहीं निरोधक दल की भर्ती प्रक्रिया ऐतिहासिक रूप से अलग रही है, जिसमें भूतपूर्व सैनिकों और एनसीसी 'सी' प्रमाण-पत्र धारकों को विशेष प्रावधानों के तहत नियुक्तियां दी गई थीं। इसी आधार पर कुछ अधिकारी यह प्रश्न उठा रहे हैं कि अलग चयन प्रक्रिया, योग्यता और दायित्वों वाले संवर्गों का एकीकरण किस प्रशासनिक आधार पर किया जा रहा है।
मामले में यह सवाल भी प्रमुखता से उठाया जा रहा है कि यदि आबकारी विभाग का राजस्व प्रदर्शन संतोषजनक रहा है, मदिरा दुकानों का बंदोबस्त सफलतापूर्वक संपन्न हुआ है और दोनों शाखाएं अपने-अपने दायित्वों का निर्वहन कर रही थीं, तो फिर एकीकरण की आवश्यकता क्यों महसूस की गई। प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था में विशेषज्ञता आधारित इकाइयों और अलग-अलग कार्यात्मक शाखाओं को दक्षता बढ़ाने का माध्यम माना जाता है। ऐसे में अलग प्रकृति और दायित्वों वाले दो संवर्गों के विलय के पीछे स्पष्ट प्रशासनिक तर्क सार्वजनिक रूप से सामने आना आवश्यक है।
हाईकोर्ट द्वारा दिए गए अंतरिम स्थगन आदेश के बाद अब यह पूरा मामला न्यायिक परीक्षण के दायरे में पहुंच चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक सेवा विवाद नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता, नीति निर्माण की तर्कसंगतता और सेवा न्याय से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बन गया है। आने वाले समय में न्यायालय और सरकार के स्तर पर होने वाले निर्णय आबकारी विभाग की भावी संरचना और संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों के हितों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं।