



ओसियां। प्रसिद्ध आध्यात्मिक ग्रंथ यथार्थ गीता के रचयिता एवं संत स्वामी अड़गड़ानंद महाराज लगभग 75 वर्ष बाद अपनी जन्मभूमि ओसियां पहुंचे। उनके आगमन को लेकर पूरे क्षेत्र में उत्साह और श्रद्धा का माहौल देखने को मिला। जोधपुर पहुंचने के बाद वे सड़क मार्ग से ओसियां रवाना हुए, जहां रास्ते भर श्रद्धालुओं और अनुयायियों ने फूल-मालाओं तथा पुष्पवर्षा के साथ उनका भव्य स्वागत किया।
जोधपुर एयरपोर्ट से लेकर ओसियां स्थित परमहंस आश्रम तक स्वागत के विशेष आयोजन किए गए। बड़ी संख्या में श्रद्धालु उनके दर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पहुंचे। स्वामी अड़गड़ानंद महाराज के पहली बार ओसियां आगमन को ऐतिहासिक और भावनात्मक क्षण के रूप में देखा जा रहा है।
स्वामी जी के शिष्य राकेशानंद महाराज ने बताया कि स्वामी अड़गड़ानंद महाराज वर्ष 1954 के आसपास ओसियां छोड़कर अनुसुइया धाम में अपने गुरु की शरण में गए थे। इसके बाद उन्होंने देशभर में आध्यात्मिक यात्राएं और प्रवास किए, लेकिन ओसियां लौटने का अवसर नहीं आया। अब लगभग 75 वर्षों बाद उनका अपनी जन्मभूमि में आगमन हुआ है, जिससे श्रद्धालुओं की वर्षों पुरानी प्रतीक्षा पूरी हो गई है।
स्वागत समारोह में स्थानीय जनप्रतिनिधियों और गणमान्य नागरिकों ने भी भाग लिया। इस अवसर पर भैराराम सियोल, आदुराम मेघवाल तथा शंभुसिंह खेतासर सहित अनेक जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे।
बुधवार शाम को आश्रम परिसर में सत्संग का आयोजन किया गया। वहीं गुरुवार को प्रवचन और विशाल भंडारे का कार्यक्रम रखा गया है। श्रद्धालु इस दौरान स्वामी जी से व्यक्तिगत रूप से मिलकर आशीर्वाद प्राप्त कर सकेंगे तथा जीवन से जुड़े विभिन्न विषयों पर मार्गदर्शन भी ले सकेंगे।
स्वामी अड़गड़ानंद महाराज का यह प्रवास तीन दिनों तक रहेगा। उनके प्रवचनों में शामिल होने के लिए राजस्थान सहित अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु ओसियां पहुंचे हैं। श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए आश्रम प्रशासन द्वारा विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं। ठहरने के लिए बड़े डोम, आवासीय सुविधाएं और भोजन व्यवस्था उपलब्ध कराई गई है। क्षेत्र के अधिकांश होटल और धर्मशालाएं पहले से ही बुक हो चुकी हैं।
स्वामी जी के आगमन को लेकर विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और व्यापारिक संगठनों के स्वयंसेवक सेवा कार्यों में जुटे हुए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह अवसर ओसियां के धार्मिक और आध्यात्मिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में याद किया जाएगा।