



भीलवाड़ा | मांडल क्षेत्र स्थित पैतृक कृषि भूमि को लेकर चल रहे पारिवारिक विवाद ने अब गंभीर कानूनी रूप ले लिया है। राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर ने मामले में हस्तक्षेप करते हुए संबंधित भूमि पर यथास्थिति (स्टेटस क्वो) बनाए रखने के आदेश जारी किए हैं। न्यायालय के निर्देश के अनुसार, अंतिम निर्णय होने तक जमीन की खरीद-फरोख्त, कब्जे में परिवर्तन अथवा किसी प्रकार का निर्माण कार्य नहीं किया जा सकेगा। इस आदेश के बाद क्षेत्र में मामले को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।
प्रकरण के अनुसार विधवा दमयंती, पुत्री स्वर्गीय गजानंद तुनायत, ने आरोप लगाया है कि उनके भाइयों ओमप्रकाश तुनायत और सुरेश चंद्र तुनायत ने संपत्ति बंटवारे का आश्वासन देकर कथित रूप से उनसे हकत्याग पत्र (त्यागपत्र) पर हस्ताक्षर करवा लिए। आरोप है कि बाद में इसी दस्तावेज के आधार पर पैतृक कृषि भूमि पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करने का प्रयास किया गया। दमयंती ने यह भी आरोप लगाया कि यह कार्य धोखे और भ्रामक जानकारी देकर कराया गया।
मामले को लेकर दमयंती की ओर से पुलिस थाना मांडल और जिला पुलिस अधीक्षक भीलवाड़ा को शिकायत दी गई थी। कार्रवाई नहीं होने पर उन्होंने अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, मांडल की अदालत में धारा 156(3) के तहत प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया। वहीं कथित हकत्याग पत्र को निरस्त करवाने के लिए सेशन न्यायालय, भीलवाड़ा में अलग से वाद भी विचाराधीन है।
स्थाई निषेधाज्ञा संबंधी प्रार्थना पत्र सेशन न्यायालय से निरस्त होने के बाद दमयंती ने राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर में अपील दायर की। सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने संबंधित भूमि से जुड़े सभी पक्षकारों और काश्तकारों को वर्तमान स्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए हैं।
सूत्रों के अनुसार, विवाद का मुख्य आधार पैतृक संपत्ति में बहन के अधिकार और कथित हकत्याग की वैधता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि पैतृक संपत्ति में पुत्री का भी समान अधिकार होता है और बिना स्वतंत्र एवं स्पष्ट सहमति के ऐसे अधिकार समाप्त नहीं किए जा सकते। यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो संबंधित दस्तावेज की वैधता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो सकते हैं।
फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश के बाद भूमि से जुड़े सभी पक्षों को न्यायालय के निर्देशों का पालन करना अनिवार्य होगा। मामले को लेकर क्षेत्र में लोगों की निगाहें अब अदालत के अंतिम निर्णय पर टिकी हुई हैं, क्योंकि यह फैसला पैतृक संपत्ति और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी पहलुओं को प्रभावित कर सकता है।




