



राजस्थान में नगरीय निकायों और पंचायतों के चुनाव लगातार टलने से संवैधानिक बहस तेज हो गई है। अधिकांश नगरपालिकाओं का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और वहां प्रशासनिक अधिकारियों को प्रशासक बनाकर कार्य कराया जा रहा है, जबकि ग्राम पंचायतों में सरपंचों को ही जिम्मेदारी सौंपी गई है। वहीं पंचायत समितियों और जिला परिषदों में भी कार्यकाल समाप्त होने के बाद अधिकारियों को प्रशासक नियुक्त किया है।
चुनाव आयोग ओबीसी आयोग की रिपोर्ट लंबित होने का हवाला देकर चुनाव टाल रहा है, जबकि सुप्रीम कोर्ट के सुरेश महाजन बनाम मध्य प्रदेश सरकार मामले में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि ओबीसी आयोग की रिपोर्ट के अभाव में भी चुनाव कराए जा सकते हैं।
संविधान के अनुच्छेद 243के और 243जेडए के तहत राज्य निर्वाचन आयोग को पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव कराने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। सुप्रीम कोर्ट ने किशनसिंह तोमर बनाम म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ अहमदाबाद (2006) में भी कहा था कि चुनाव समय पर कराना अनिवार्य है और राज्य सरकार की देरी इसका आधार नहीं बन सकती। इसके बावजूद व्यावहारिक स्तर पर परिसीमन और आरक्षण निर्धारण जैसी प्रक्रियाएं, जो राज्य सरकार के अधीन हैं, चुनाव में देरी का कारण बन रही हैं।
हाईकोर्ट की एकलपीठ ने 20 सितंबर 2025 को स्पष्ट किया था कि निर्वाचन आयोग चुनाव में देरी को लेकर आंख बंद नहीं कर सकता और उसे संवैधानिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए, हालांकि खंडपीठ ने इस आदेश पर रोक लगाते हुए सरकार को राहत दी थी। बाद में खंडपीठ ने 31 दिसंबर 2025 तक परिसीमन और 15 अप्रैल 2026 तक चुनाव कराने के निर्देश दिए, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा।
ओबीसी आरक्षण के लिए गठित आयोग का कार्यकाल 31 मार्च तक ही है, जबकि आयोग ने सरकार को सूचित किया है कि करीब 400 ग्राम पंचायतों के आंकड़ों में मिसमैच है। ऐसे में सर्वे की आवश्यकता पड़ सकती है, जिससे और देरी होना तय माना जा रहा है। इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य में लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक दायित्वों को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।