Friday, 20 March 2026

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत का बयान: दुनिया में संघर्ष की जड़ स्वार्थ, शांति के लिए धर्म और अनुशासन जरूरी


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत का बयान: दुनिया में संघर्ष की जड़ स्वार्थ, शांति के लिए धर्म और अनुशासन जरूरी

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नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने शुक्रवार को कहा कि दुनिया में अधिकांश संघर्षों की असली वजह स्वार्थी हित और वर्चस्व की चाहत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्थायी शांति केवल एकता, अनुशासन और धर्म के पालन से ही संभव है। भागवत नागपुर में विश्व हिंदू परिषद (VHP) के कार्यालय की आधारशिला रखने के बाद आयोजित सभा को संबोधित कर रहे थे।

अपने संबोधन में भागवत ने कहा कि पिछले करीब 2,000 वर्षों से दुनिया ने संघर्षों को सुलझाने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन उन्हें सीमित सफलता ही मिली। उन्होंने भारत की परंपरा को सद्भाव और मानवता पर आधारित बताते हुए कहा कि वैश्विक स्तर पर भी यह विश्वास बढ़ रहा है कि भारत जैसे देश ही अंतरराष्ट्रीय विवादों, जैसे ईरान-इजराइल संघर्ष, में शांति स्थापित करने में भूमिका निभा सकते हैं।

भागवत ने कहा कि भारत के लोग मानवता के सिद्धांतों पर चलते हैं, जबकि दुनिया के कई हिस्सों में अब भी ‘जंगल के कानून’ की मानसिकता देखी जाती है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में धार्मिक असहिष्णुता, जबरन धर्म परिवर्तन और सामाजिक भेदभाव जैसी समस्याएं बनी हुई हैं, जिनका समाधान भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित है।

उन्होंने यह भी कहा कि धर्म केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि यह लोगों के आचरण में भी दिखना चाहिए। अनुशासन और नैतिक मूल्यों को जीवन में उतारने के लिए निरंतर अभ्यास आवश्यक है, भले ही इसके लिए व्यक्तिगत स्तर पर चुनौतियों का सामना करना पड़े।

इसके साथ ही भागवत ने संगठनात्मक बदलावों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि RSS का कार्य तेजी से बढ़ रहा है और लोगों की अपेक्षाएं भी बढ़ रही हैं, इसलिए संगठन में विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया शुरू की गई है। पहले जहां संघ में 46 प्रांत थे, अब उन्हें बढ़ाकर 86 संभागों में विभाजित किया जा रहा है, ताकि स्थानीय स्तर पर कार्य अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सके। भागवत ने स्पष्ट किया कि संगठन के मूल कार्य करने के तरीके में कोई बदलाव नहीं होगा। समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए मित्रता और आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करना ही संघ का प्रमुख मार्ग रहेगा, जो आगे भी जारी रहेगा।

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