Wednesday, 04 February 2026

पॉक्सो में रोमियो-जूलियट क्लॉज जोड़ने का सुझाव, राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग से जुड़े केस को किया रद्द


पॉक्सो में रोमियो-जूलियट क्लॉज जोड़ने का सुझाव, राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग से जुड़े केस को किया रद्द

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राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग से यौन अपराध (पॉक्सो) के एक मामले को रद्द करते हुए केंद्र सरकार को पॉक्सो कानून में ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ (आपसी सहमति वाले किशोर संबंधों को पॉक्सो के दायरे से अलग रखने) का प्रावधान जोड़ने का महत्वपूर्ण सुझाव दिया है। यह आदेश जस्टिस अनिल उपमन की अदालत ने 19 वर्षीय युवक की याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया।

अदालत ने कहा कि देशभर में पॉक्सो के तहत दर्ज मामलों का एक बड़ा हिस्सा रोमियो-जूलियट प्रकृति का है—जहां किशोर-किशोरी (दोनों नाबालिग) या किशोर-युवा (नाबालिग और बालिग) आपसी सहमति से रिश्ते में होते हैं। उम्र के तकनीकी अंतर और सामाजिक-पारिवारिक असहमति के चलते ऐसे मामले गंभीर आपराधिक मुकदमों में बदल दिए जाते हैं।

मौजूदा ढांचा सहमति और शोषण में फर्क नहीं कर पाता
12 जनवरी की सुनवाई में कोर्ट ने टिप्पणी की कि मौजूदा कानूनी ढांचा यौन शोषण और सहमति से बने किशोर संबंधों के बीच स्पष्ट अंतर करने में नाकाम है। अदालत ने यह भी कहा कि पॉक्सो लागू होने के बाद सामने आए आंकड़ों में एक बड़ा प्रतिशत ऐसे मामलों का है, जहां 16 से 18 वर्ष के बीच के किशोर/युवा कमिटेड रिलेशनशिप में हैं। वर्ष 2012 से पहले ऐसी परिस्थितियां अपराध की श्रेणी में नहीं आती थीं, लेकिन पॉक्सो लागू होने के बाद लड़की की सहमति को महत्व दिए बिना इन्हें दंडनीय अपराध मान लिया गया।

पुलिस और ट्रायल कोर्ट की ‘मशीनरी’ भूमिका पर सवाल
मामले के तथ्यों पर अदालत ने कहा कि 19 वर्षीय युवक पर 17 वर्षीय किशोरी के अपहरण और यौन शोषण का आरोप पॉक्सो के तहत दर्ज किया गया, जबकि किशोरी ने पुलिस और ट्रायल कोर्ट के समक्ष दिए बयानों में स्पष्ट कहा था कि वह अपनी मर्जी से घर से गई थी, किसी प्रकार की जबरदस्ती नहीं हुई और न ही सहमति या जबरन कोई संबंध बना। मेडिकल रिपोर्ट में भी यौन शोषण की पुष्टि नहीं हुई, इसके बावजूद पुलिस ने अपहरण और बलात्कार की धाराओं में चालान पेश किया और ट्रायल कोर्ट ने आरोप भी तय कर दिए।

अदालत ने इन परिस्थितियों में मामले को रद्द करते हुए कहा कि कानून का उद्देश्य वास्तविक शोषण से बच्चों की सुरक्षा है, न कि सहमति आधारित किशोर संबंधों को आपराधिक जाल में फंसाना। कोर्ट ने केंद्र सरकार से कानून में आवश्यक संशोधन पर विचार करने का सुझाव दिया।

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