



जयपुर, वेदांता द्वारा प्रस्तुत जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल 2026 का पाँचवां और अंतिम दिन विचारों, रचनात्मकता और बौद्धिक संवाद का उत्सव बनकर सामने आया। कविता, मांगा कॉमिक्स, मिथक, विज्ञान, इतिहास, चिकित्सा, जलवायु परिवर्तन और समकालीन कथा साहित्य जैसे विविध विषयों पर हुए सत्रों ने यह साबित किया कि जेएलएफ केवल किताबों का मेला नहीं, बल्कि वैश्विक विचार-विमर्श का सबसे बड़ा मंच है। पाँच दिनों तक चले इस आयोजन का समापन बहस, संवेदना और जिज्ञासा के साथ हुआ, जिसने श्रोताओं को नए दृष्टिकोण दिए।
अंतिम दिन की शुरुआत ब्रिटिश कवयित्री एलिस ऑसवाल्ड के सत्र ‘ए जर्नी थ्रू वर्ड्स एंड वर्ल्ड्स’ से हुई, जहाँ उन्होंने कविता, स्मृति, मृत्यु, जल और मानवीय संबंधों के बीच गहरे संबंधों को उजागर किया। ग्रीक देवी आइरिस के आह्वान से शुरू हुए इस सत्र में उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृतियों अ शॉर्ट स्टोरी ऑफ़ फ़ॉलिंग, अ बैरिस्टर फ़ॉर द डॉन और मेमोरियल से पाठ किया, जिसमें युद्ध में मारे गए साधारण सैनिकों की मानवीय कहानियों को केंद्र में रखा गया।
दृश्यात्मक कथा पर केंद्रित सत्र ‘सेलिब्रेटिंग मांगा एंड ग्राफ़िक नॉवेल्स’ में जापानी मंगा कलाकार योशितोकी ओइमा, अनुवादक तोमोको किकुची, और भारतीय ग्राफ़िक नॉवेल रचनाकार उजान दत्ता व अबीर कपूर ने कॉमिक्स की वैश्विक लोकप्रियता और चित्रों की कथा शक्ति पर चर्चा की। बुलीइंग, दोस्ती और संवाद जैसे विषयों पर आधारित अ साइलेंट वॉइस के ज़रिए यह बताया गया कि ग्राफ़िक माध्यम किस तरह गहरे सामाजिक मुद्दों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत कर सकता है।
मिथक और कल्पना के सत्र ‘द लीजेंड ऑफ़ कुमारीकंदम’ में आनंद नीलकंठन और मृदुला रमेश ने लुप्त सभ्यताओं, मिथकों और विज्ञान के संगम पर संवाद किया। नीलकंठन ने बताया कि भारतीय मिथकों को केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और तार्किक नजरिए से देखने की आवश्यकता है, ताकि नई पीढ़ी उनसे जुड़ सके।
इतिहास में महिलाओं की आवाज़ों को केंद्र में लाने वाले सत्र ‘लेजेंडा: द रियल वीमेन बिहाइंड द मिथ्स’ में इतिहासकार जनीना रामिरेज़ ने नारायणी बासु के साथ चर्चा करते हुए बताया कि किस तरह सदियों से महिलाओं की कहानियों को बदला, दबाया या भुला दिया गया। उन्होंने जोन ऑफ़ आर्क, लेडी गोडाइवा और रानी लक्ष्मीबाई जैसे उदाहरणों के माध्यम से इतिहास की एकतरफा व्याख्याओं को चुनौती दी।
समकालीन समाज और पीढ़ियों के बदलाव पर आधारित सत्र ‘जेन ज़ी, द मिलेनियल्स एंड मम्मीजी’ में अनुराग माइनस वर्मा, संतोष देसाई और रिया चोपड़ा ने डिजिटल संस्कृति, पहचान, उपभोक्तावाद और सामाजिक मूल्यों पर विचार रखे। इस सत्र में यह स्पष्ट हुआ कि इंटरनेट और तकनीक ने पहचान के निर्माण और अभिव्यक्ति को किस तरह बदल दिया है।
चिकित्सा और मानवीय संवेदना के पहलुओं पर रैचेल क्लार्क ने अपनी पुस्तक ‘द स्टोरी ऑफ़ अ हार्ट’ के माध्यम से अंगदान, चिकित्सा नैतिकता और भावनात्मक अनुभवों पर चर्चा की। वहीं जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा विकल्पों पर हुए सत्र में प्रेम शंकर झा, अव्यन्ना मेहता और मृदुला रमेश ने सतत विकास और भारत के ऊर्जा भविष्य पर गंभीर संवाद किया।
फ़ेस्टिवल का समापन बहुप्रतीक्षित क्लोज़िंग डिबेट ‘फ़्रीडम ऑफ़ स्पीच इज़ अ डेंजरस आइडिया’ से हुआ, जिसमें इयान हिस्लॉप, पवन वर्मा, एलिस ऑसवाल्ड, नवतेज सरना, प्रियंका चतुर्वेदी सहित कई प्रमुख वक्ताओं ने भाग लिया। वीर सांघवी द्वारा संचालित इस बहस में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सत्ता और लोकतंत्र के जटिल संबंधों पर गहन विचार-विमर्श हुआ।
जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल 2026 के 19वें संस्करण का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि विविध विचार, बहस और संवाद ही लोकतंत्र और समाज को आगे बढ़ाते हैं। यह फ़ेस्टिवल एक बार फिर सीमाओं और पीढ़ियों से परे जाकर संवाद, प्रेरणा और बौद्धिक स्वतंत्रता का उत्सव बन गया।