



जयपुर। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) में आयोजित ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ सत्र के दौरान राजस्थान के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) राजीव शर्मा ने समाज में पुलिस की छवि, मीडिया की भूमिका और बदलती पुलिस व्यवस्था पर खुलकर विचार रखे। उन्होंने कहा कि बहुत कम लोगों का पुलिस से प्रत्यक्ष संपर्क होता है, जबकि अधिकांश लोग पुलिस को फिल्मों, किताबों और अब ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखाई जाने वाली कहानियों के आधार पर समझते हैं। इसी कारण आम जनता की धारणा अक्सर एकतरफा या अतिरंजित बन जाती है।
डीजीपी राजीव शर्मा ने कहा कि मीडिया, लेखकों और रचनाकारों की बड़ी जिम्मेदारी है कि वे पुलिस को लेकर समाज के सामने संतुलित और तथ्यपरक दृष्टिकोण रखें। उन्होंने स्वीकार किया कि पुलिस व्यवस्था में कमियां हैं और कई बार गलतियां भी होती हैं, जिन्हें उजागर किया जाना जरूरी है। लेकिन इसके साथ-साथ पुलिस द्वारा किए जा रहे सकारात्मक और सराहनीय कार्यों को भी सामने लाया जाना उतना ही आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि पुलिसकर्मी कठिन परिस्थितियों, सीमित संसाधनों और भारी दबाव के बीच भी समाज की सेवा करते हैं, लेकिन उनके अच्छे प्रयास अक्सर चर्चा में नहीं आ पाते। यदि सकारात्मक कार्यों को भी पहचान मिले, तो जनता के सामने पुलिस की एक वास्तविक, संतुलित और भरोसेमंद तस्वीर उभर सकती है।
फिल्मों का उदाहरण देते हुए डीजीपी राजीव शर्मा ने कहा कि अधिकांश फिल्मों में पुलिस को तब दिखाया जाता है, जब सब कुछ हो चुका होता है—तेज सायरन, पुरानी जीप और अंतिम दृश्य के रूप में। जबकि आज की पुलिस तकनीक, प्रशिक्षण और कार्यशैली के स्तर पर काफी आगे बढ़ चुकी है। साइबर क्राइम, फॉरेंसिक साइंस, डेटा एनालिटिक्स और आधुनिक जांच तकनीकों के इस्तेमाल से पुलिस समय के साथ खुद को बेहतर बना रही है।
सत्र के अंत में डीजीपी राजीव शर्मा ने लेखकों, पत्रकारों और रचनाकारों से अपील की कि वे निर्भीक होकर लिखते रहें, सच को सामने लाएं और समाज को सकारात्मक दिशा में प्रेरित करें। उन्होंने कहा कि जिम्मेदार और सकारात्मक लेखन न केवल जनता की सोच को संतुलित करता है, बल्कि पुलिस व्यवस्था को भी आत्ममंथन और सुधार के लिए प्रेरणा देता है।