



जयपुर। राजस्थान की ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है। प्रदेश के 15 किले, महल, बावड़ियां और अन्य ऐतिहासिक स्मारकों को ‘एडॉप्ट ए हेरिटेज’ योजना के तहत निजी संस्थाओं, बड़े कॉरपोरेट घरानों, फाउंडेशनों और सक्षम संगठनों के सहयोग से विकसित और संरक्षित करने की योजना बनाई गई है।
पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग ने पहले चरण के लिए 15 स्मारकों का चयन कर उनकी सूची राज्य सरकार को भेज दी है। योजना को लागू करने से पहले अब मंत्रिमंडल की मंजूरी ली जाएगी। महत्वपूर्ण बात यह है कि इन स्मारकों का स्वामित्व या प्रशासनिक नियंत्रण निजी संस्थाओं को नहीं दिया जाएगा। नियंत्रण पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के पास ही रहेगा, जबकि चयनित संस्थाएं इनके रखरखाव, सुविधाओं के विकास और पर्यटन संवर्धन में सहयोग करेंगी।
राज्य सरकार की मंशा के बाद पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग ने प्रदेश के सभी 7 संभागों से ऐसे ऐतिहासिक स्मारकों के प्रस्ताव मांगे थे, जिन्हें इस योजना में शामिल किया जा सके।संबंधित अधिकारियों और अधीक्षकों से मिले प्रस्तावों की विभागीय स्तर पर समीक्षा की गई। पर्यटन की संभावना, स्मारक की मौजूदा स्थिति, रखरखाव की आवश्यकता और उपलब्ध बजट जैसे पहलुओं पर विचार करने के बाद पहले चरण के लिए 15 स्मारकों का चयन किया गया। विभाग के निदेशक पंकज धीरेंद्र ने बताया कि संबंधित अधीक्षकों की राय के आधार पर इन स्मारकों को चुना गया है।
अजमेर वृत्त से कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहरों को योजना में शामिल करने का प्रस्ताव है।इनमें किला सरवाड़, किला फतहगढ़ और नागौर के मेड़ता सिटी स्थित दुर्ग मालकोट शामिल हैं।राजस्थान के इन क्षेत्रों में ऐतिहासिक पर्यटन की पर्याप्त संभावना होने के बावजूद कई स्थानों पर पर्यटक सुविधाओं और नियमित रखरखाव की कमी लंबे समय से महसूस की जा रही है।
कोटा वृत्त से राजस्थान के कई प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों को इस योजना में शामिल किया गया है।
इनमें:
रानीजी की बावड़ी, बूंदी
सुखमहल, बूंदी
केलवाड़ा दुर्ग, बारां
गागरोन दुर्ग, झालावाड़
प्रमुख रूप से शामिल हैं।
विशेष रूप से बूंदी अपनी बावड़ियों, महलों और ऐतिहासिक स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध है। योजना के तहत इन स्थलों पर पर्यटक सुविधाओं को बेहतर बनाने पर जोर दिया जा सकता है।
जोधपुर वृत्त से जालोर दुर्ग और मंडोर स्थित जनाना महल को इस योजना के लिए चुना गया है।जालोर दुर्ग राजस्थान के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक किलों में शामिल है, जबकि मंडोर जोधपुर के प्रमुख ऐतिहासिक और पर्यटन स्थलों में से एक है।
भरतपुर वृत्त से किला वैर और धौलपुर की तालाबशाही बाड़ी को प्रस्तावित सूची में शामिल किया गया है।दिलचस्प बात यह है कि वैर किले में राज्य सरकार पहले से ही जीर्णोद्धार कार्य करा रही है। इसके बावजूद इसे ‘एडॉप्ट ए हेरिटेज’ योजना में शामिल किए जाने की तैयारी है।वहीं कुछ अन्य स्मारक ऐसे हैं, जिनके रखरखाव और पर्यटन विकास के लिए लंबे समय से पर्याप्त बजट उपलब्ध नहीं हो पाया है।
दौसा जिले की ऐतिहासिक भांडारेज बावड़ी को भी पहले चरण के महत्वपूर्ण स्मारकों में शामिल किया गया है। भांडारेज क्षेत्र अपनी ऐतिहासिक स्थापत्य कला और बावड़ियों के लिए जाना जाता है। योजना लागू होने के बाद यहां पर्यटक सुविधाओं और संरक्षण कार्यों को नया आधार मिल सकता है।
योजना में सबसे महत्वपूर्ण शर्त ऐतिहासिक स्मारकों के मूल स्वरूप और विरासत को सुरक्षित रखना होगी। गोद लेने वाली संस्था को नए निर्माण या मूल संरचना में मनमाना बदलाव करने की अनुमति नहीं होगी। किसी भी संरक्षण या विकास कार्य के लिए पुरातत्व विभाग द्वारा तय मानकों का पालन करना होगा। इससे यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जाएगी कि व्यावसायिक गतिविधियों के कारण स्मारक की ऐतिहासिक पहचान प्रभावित न हो।
योजना के तहत निर्धारित शर्तों के अधीन स्मारक परिसर या निर्धारित क्षेत्रों में कुछ व्यावसायिक गतिविधियों की अनुमति दी जा सकती है। इनमें दुकान, कैफेटेरिया, विज्ञापन और पर्यटकों से जुड़ी अन्य सुविधाएं शामिल हो सकती हैं। हालांकि ऐसी सभी गतिविधियों के लिए विभागीय या सरकारी अनुमति आवश्यक होगी। इनके लिए विस्तृत नियम और शर्तें राज्य सरकार स्तर पर तैयार की जा रही हैं।
‘गोद देने’ शब्द को लेकर स्थिति स्पष्ट करते हुए विभाग ने कहा है कि इससे स्मारकों का स्वामित्व या नियंत्रण निजी हाथों में नहीं जाएगा।
पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग का नियंत्रण बना रहेगा।
निजी संस्था या संगठन का काम मुख्य रूप से संरक्षण, रखरखाव, पर्यटक सुविधाओं में सुधार और पर्यटन संवर्धन में सहयोग करना होगा।
योजना का विस्तृत प्रारूप तैयार करने के लिए विभाग एक बड़ी सलाहकार फर्म की मदद भी ले रहा है। इसमें यह तय किया जा रहा है कि निजी संस्थाओं की जिम्मेदारी क्या होगी, उन्हें कितने समय के लिए स्मारक से जोड़ा जाएगा, व्यावसायिक गतिविधियों की सीमा क्या होगी और राजस्व एवं संरक्षण संबंधी नियम कैसे लागू होंगे।
योजना को लेकर विभागीय स्तर पर कुछ सवाल भी सामने आए हैं। कुछ अधिकारियों का मानना है कि जिन स्मारकों के संरक्षण और रखरखाव के लिए वर्षों से पर्याप्त सरकारी बजट नहीं मिल पाया, उनके लिए निजी भागीदारी को विकल्प बनाने के बजाय पहले सरकारी स्तर पर बजट बढ़ाने की संभावना पर भी विचार होना चाहिए।वहीं योजना के समर्थकों का तर्क है कि निजी और संस्थागत सहयोग से ऐतिहासिक स्थलों पर बेहतर सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं और पर्यटन को नई गति मिल सकती है।
पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के निदेशक पंकज धीरेंद्र के अनुसार पहले चरण में 15 स्मारकों का चयन कर प्रस्ताव सरकार को भेज दिया गया है। अब राज्य मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद योजना को औपचारिक रूप से लागू किया जाएगा।योजना लागू होने के बाद चयनित निजी संस्थाओं, फाउंडेशनों और संगठनों के लिए नियम और जिम्मेदारियां स्पष्ट की जाएंगी।राजस्थान जैसे ऐतिहासिक धरोहरों से समृद्ध राज्य में यह योजना सफल रहती है तो आने वाले चरणों में और भी किले, महल, बावड़ियां और संरक्षित स्मारक इसमें शामिल किए जा सकते हैं।