Sunday, 30 August 2026

जयपुर निगम चुनाव में भाजपा के सामने ‘कार्यकर्ता बनाम रिश्तेदार’ की चुनौती, 13 नामों पर भाई-भतीजावाद की चर्चा


जयपुर निगम चुनाव में भाजपा के सामने ‘कार्यकर्ता बनाम रिश्तेदार’ की चुनौती, 13 नामों पर भाई-भतीजावाद की चर्चा

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जयपुर। नगर निगम चुनाव में भाजपा के भीतर टिकट वितरण को लेकर अब भाई-भतीजावाद और रिश्तेदारों को आगे बढ़ाने की चर्चा तेज हो गई है। शहर के अलग-अलग वार्डों से करीब 13 ऐसे नाम सामने आए हैं, जिन्हें पार्टी से जुड़े प्रभावशाली नेताओं ने अपने भाई, भतीजे या अन्य रिश्तेदारों के लिए आगे बढ़ाया है।

खास बात यह है कि इन नामों को केवल व्यक्तिगत स्तर की सिफारिश तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि कुछ दावेदारों को विधायक, मंत्री और मंडल स्तर से तैयार पैनल में भी जगह मिल गई है। अब इन नामों पर अंतिम फैसला पार्टी की सेंट्रल कमेटी के स्तर पर होना है।

केंद्रीय स्तर पर होगी असली परीक्षा

भाजपा लगातार यह कहती रही है कि निकाय चुनाव में टिकट मेरिट, कार्यकर्ता की सक्रियता और जीत की क्षमता के आधार पर दिया जाएगा। ऐसे में नीचे से सिफारिश के साथ पहुंचे रिश्तेदारों के नामों को केंद्रीय स्तर पर कितनी प्राथमिकता मिलती है, इस पर अब सबकी नजर है।

यदि प्रभावशाली नेताओं के रिश्तेदारों को बड़ी संख्या में टिकट मिलता है, तो पार्टी के भीतर यह सवाल उठ सकता है कि लंबे समय से संगठन में काम कर रहे कार्यकर्ताओं की तुलना में पारिवारिक या राजनीतिक सिफारिश को ज्यादा महत्व दिया गया।

‘कार्यकर्ता की मेहनत बनाम नेता की सिफारिश’ बन सकता है मुद्दा

टिकट चयन में यदि रिश्तेदारी का प्रभाव ज्यादा दिखाई देता है तो यह पार्टी के भीतर ‘कार्यकर्ता की मेहनत बनाम नेता की सिफारिश’ के रूप में बड़ा मुद्दा बन सकता है।

कई पुराने कार्यकर्ता लंबे समय से अपने वार्डों में संगठन की जिम्मेदारी निभाते रहे हैं। ऐसे में यदि उनकी जगह किसी प्रभावशाली नेता के रिश्तेदार को टिकट मिलता है तो असंतोष खुलकर सामने आ सकता है। यही वजह है कि पार्टी नेतृत्व के सामने केवल जिताऊ उम्मीदवार चुनने की चुनौती नहीं है, बल्कि संगठनात्मक संतुलन बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

टिकट कटने पर बगावत का खतरा

कई वार्डों में पहले से एक से अधिक मजबूत दावेदार सक्रिय हैं। यदि किसी दावेदार का टिकट किसी नेता के रिश्तेदार के पक्ष में कटता है, तो वहां बगावत या निर्दलीय दावेदारी की संभावना बढ़ सकती है।

इससे भाजपा को सीधे चुनावी नुकसान के साथ भीतरघात का भी सामना करना पड़ सकता है। निकाय चुनाव में वार्ड स्तर पर व्यक्तिगत प्रभाव ज्यादा मायने रखता है, इसलिए नाराज कार्यकर्ता चुनाव परिणाम पर असर डाल सकते हैं।

जमीनी कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देने की मांग

पार्टी के कई कार्यकर्ताओं का कहना है कि टिकट ऐसे लोगों को मिलना चाहिए जो लंबे समय से संगठन के लिए काम कर रहे हैं और वार्ड में उनकी सीधी पकड़ है। उनका तर्क है कि केवल किसी मंत्री, विधायक या बड़े नेता से रिश्तेदारी टिकट का आधार नहीं बननी चाहिए। यदि पार्टी वास्तव में मेरिट और जीत की क्षमता का फार्मूला लागू करती है, तो जमीनी कार्यकर्ताओं को उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।

सेंट्रल कमेटी के फैसले पर टिकी नजर

अब पूरी नजर सेंट्रल कमेटी के फैसले पर है। यही तय करेगा कि पैनल में पहुंचे रिश्तेदारों के नामों को मंजूरी मिलती है या पार्टी संगठन में काम करने वाले पुराने कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता दी जाती हैनिकाय चुनाव में टिकट वितरण का यह चरण भाजपा के लिए बेहद संवेदनशील माना जा रहा है, क्योंकि एक गलत फैसला कई वार्डों में असंतोष और बगावत को जन्म दे सकता है।

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