



309 नगरीय निकायों के चुनाव की तैयारी तेज, पंचायत आरक्षण लॉटरी सितंबर तक टली, 10,245 वार्डों की आरक्षण प्रक्रिया पूरी होने के बाद सियासी हलचल बढ़ी
जयपुर। राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं और नगरीय निकायों के आगामी चुनावों को लेकर सियासी और प्रशासनिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। राज्य सरकार द्वारा पंचायती राज संस्थाओं की आरक्षण लॉटरी प्रक्रिया को सितंबर 2026 तक टालने के फैसले के बाद अब यह लगभग साफ हो गया है कि प्रदेश में नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव अलग-अलग समय पर कराए जाएंगे।
इस फैसले के साथ लंबे समय से चर्चा में रहे ‘वन स्टेट, वन इलेक्शन’ के मॉडल पर फिलहाल विराम लगता दिखाई दे रहा है। दूसरी ओर, राज्य निर्वाचन आयोग जल्द ही 309 नगरीय निकायों के चुनाव कार्यक्रम की घोषणा की तैयारी में है।
पंचायती राज संस्थाओं में वार्डों और पदों के आरक्षण की लॉटरी प्रक्रिया को सितंबर तक स्थगित किए जाने से पंचायत चुनाव का कार्यक्रम आगे खिसकना तय माना जा रहा है।
इसी के चलते संभावना है कि पहले नगरीय निकाय चुनाव कराए जाएंगे और पंचायत चुनाव बाद में होंगे। सरकार के इस फैसले के बाद ग्रामीण क्षेत्रों के संभावित प्रत्याशियों और राजनीतिक दलों की निगाहें अब पंचायत आरक्षण की नई तारीखों पर टिकी हैं।
राज्य निर्वाचन आयोग नगरीय निकाय चुनावों को लेकर तैयारियां तेज कर चुका है। प्रदेश के 309 नगरीय निकायों में चुनाव कराए जाने हैं।
निकाय चुनाव की सबसे अहम प्रक्रिया में शामिल वार्ड आरक्षण लॉटरी पूरी होने के बाद अब अगला बड़ा कदम चुनाव कार्यक्रम और मतदान की तारीखों की घोषणा होगा।
इस कारण नगर निगम, नगर परिषद और नगरपालिकाओं में टिकट के दावेदारों ने भी अपनी सक्रियता बढ़ा दी है।
प्रदेश के नगरीय निकायों के कुल 10,245 वार्डों की आरक्षण लॉटरी सोमवार को पूरी हो गई। इसके बाद कई मौजूदा पार्षदों और संभावित प्रत्याशियों के चुनावी समीकरण बदल गए हैं।
कई वार्ड महिला, SC, ST और OBC वर्ग के लिए आरक्षित होने के बाद ऐसे नेताओं को भी नई रणनीति बनानी पड़ रही है जो लंबे समय से अपने मौजूदा वार्ड से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे। बीजेपी और कांग्रेस दोनों दलों ने वार्डवार समीकरणों का आकलन शुरू कर दिया है और स्थानीय स्तर पर संभावित उम्मीदवारों के नामों पर मंथन तेज कर दिया गया है।
राज्य सरकार ने निकाय और पंचायत चुनाव अलग-अलग कराने के पीछे प्रशासनिक और विकास कार्यों की निरंतरता का तर्क दिया है।
सरकार के आधिकारिक पक्ष के अनुसार यदि नगरीय निकाय और पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव एक साथ घोषित किए जाते तो आदर्श आचार संहिता पूरे प्रदेश में एक साथ लागू हो जाती।
इससे ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में चल रहे विकास कार्य, नई योजनाओं की स्वीकृतियां और कई प्रशासनिक प्रक्रियाएं प्रभावित होतीं।
सरकार का तर्क है कि दोनों चुनाव अलग-अलग कराने से विकास कार्यों पर एक साथ ब्रेक नहीं लगेगा। इससे प्रशासनिक तंत्र पर भी एक साथ दो बड़े चुनावों का दबाव नहीं पड़ेगा।
इसके साथ ही आम जनता के रोजमर्रा के प्रशासनिक कामों और विकास योजनाओं की गति को भी बनाए रखा जा सकेगा।इस निर्णय के पीछे प्रशासनिक संसाधनों का बेहतर उपयोग भी एक महत्वपूर्ण कारण बताया जा रहा है।
पंचायत चुनाव की आरक्षण लॉटरी टालने के फैसले पर विपक्षी नेताओं ने सवाल उठाए हैं। पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने इसे हाईकोर्ट के आदेशों से जोड़ते हुए अवमानना का आरोप लगाया है और कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी है। इससे पंचायत चुनाव की समयसीमा को लेकर राजनीतिक विवाद भी तेज हो गया है। अब इस मुद्दे पर सरकार के अगले कदम और न्यायिक स्तर पर होने वाली संभावित कार्रवाई पर भी नजर रहेगी।
नगरीय निकायों में आरक्षण की स्थिति स्पष्ट होते ही बड़ी संख्या में महिला दावेदारों और आरक्षित वर्ग के संभावित प्रत्याशियों की सक्रियता बढ़ गई है। जिन वार्डों में आरक्षण बदला है, वहां राजनीतिक दलों को नए चेहरे तलाशने होंगे। वहीं कई पुराने नेताओं को वार्ड बदलने या परिवार के किसी पात्र सदस्य को चुनावी मैदान में उतारने जैसी रणनीतियों पर विचार करना पड़ सकता है।
बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही प्रमुख दलों ने निकाय चुनाव की तैयारी तेज कर दी है। वार्डवार आरक्षण की स्थिति, स्थानीय लोकप्रियता, जातीय-सामाजिक समीकरण और जीत की क्षमता के आधार पर उम्मीदवारों के नामों पर चर्चा शुरू हो चुकी है।आने वाले दिनों में दोनों दल जिला और निकाय स्तर पर बैठकों का दौर और तेज कर सकते हैं।
फिलहाल प्रदेश की निगाहें राज्य निर्वाचन आयोग की अगली आधिकारिक घोषणा पर टिकी हैं।निकाय चुनाव की तारीखों का ऐलान होते ही संबंधित शहरी क्षेत्रों में आदर्श आचार संहिता प्रभावी हो जाएगी और चुनावी प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू हो जाएगी।वहीं पंचायत चुनावों के लिए सितंबर में आरक्षण लॉटरी पूरी होने के बाद अलग से चुनाव कार्यक्रम घोषित किए जाने की संभावना है।