



विपक्ष के हंगामे के बीच ध्वनि मत से मिली मंजूरी; जांच दो महीने और मुकदमे की सुनवाई तीन महीने में पूरी करने का प्रावधान
नई दिल्ली। पेपर लीक और सार्वजनिक परीक्षाओं में संगठित धांधली पर अंकुश लगाने से जुड़ा ‘लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026’ बुधवार को लोकसभा में ध्वनि मत से पारित हो गया। विपक्षी सदस्यों के हंगामे और नारेबाजी के बीच सदन ने विधेयक को मंजूरी दी। अब इसे राज्यसभा में विचार और पारित करने के लिए पेश किया जाएगा।
यह विधेयक वर्ष 2024 में लागू किए गए लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम में संशोधन करता है। सरकार का कहना है कि नए प्रावधानों से पेपर लीक, संगठित नकल और परीक्षा प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने वालों के विरुद्ध अधिक कठोर एवं समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित हो सकेगी। विधेयक 27 जुलाई 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था।
विधेयक पर मंगलवार को दोपहर से रात तक करीब नौ घंटे चर्चा हुई थी। कई सांसदों का संबोधन बाकी रहने के कारण सदन की कार्यवाही बुधवार तक स्थगित कर दी गई थी। बुधवार को चर्चा दोबारा शुरू हुई और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी विधेयक तथा विद्यार्थियों से जुड़े मुद्दों पर अपना पक्ष रखा।
राहुल गांधी के भाषण के दौरान छात्र आंदोलन और पुलिस कार्रवाई को लेकर की गई टिप्पणियों पर सत्ता पक्ष ने आपत्ति जताई। इसके बाद सदन में हंगामा हुआ और सरकार की ओर से उनसे अपने आरोप प्रमाणित करने अथवा माफी मांगने की मांग की गई। हंगामे के बीच विधेयक को ध्वनि मत से पारित कर दिया गया।
संशोधन विधेयक के अनुसार किसी व्यक्ति द्वारा अनुचित साधनों का इस्तेमाल करने अथवा परीक्षा संबंधी अपराध में शामिल पाए जाने पर न्यूनतम सजा तीन वर्ष से बढ़ाकर पांच वर्ष और अधिकतम सजा दस वर्ष करने का प्रावधान है। ऐसे अपराध में अधिकतम जुर्माना ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹50 लाख किया गया है।
परीक्षा आयोजित करने वाली सेवा प्रदाता एजेंसी के दोषी पाए जाने पर अधिकतम जुर्माना ₹1 करोड़ से बढ़ाकर ₹5 करोड़ किया गया है। ऐसी एजेंसी को सार्वजनिक परीक्षा से संबंधित जिम्मेदारी दिए जाने पर प्रतिबंध की अवधि भी चार वर्ष से बढ़ाकर आठ वर्ष करने का प्रस्ताव है।
पेपर लीक अथवा परीक्षा धोखाधड़ी को संगठित अपराध के रूप में अंजाम देने वाले व्यक्ति, समूह, परीक्षा प्राधिकरण, सेवा प्रदाता अथवा संस्था के लिए न्यूनतम कारावास पांच वर्ष से बढ़ाकर सात वर्ष किया गया है। अधिकतम सजा दस वर्ष तक रहेगी।
संगठित अपराध के मामले में न्यूनतम जुर्माना ₹1 करोड़ से बढ़ाकर ₹10 करोड़ करने का प्रावधान किया गया है। इस प्रकार ₹10 करोड़ का प्रावधान संगठित अपराध के मामलों में न्यूनतम जुर्माने के रूप में लागू होगा।
विधेयक में परीक्षा संबंधी अपराध की जांच दो महीने के भीतर पूरी करने का प्रावधान है। केंद्र सरकार आवश्यकता पड़ने पर विशेष कार्यबल यानी एसटीएफ का गठन कर जांच सौंप सकेगी।
राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए सत्र न्यायालय को विशेष फास्ट ट्रैक अदालत के रूप में नामित करना होगा। आरोप-पत्र दाखिल होने के बाद मुकदमे की सुनवाई प्रतिदिन की जाएगी और इसे तीन महीने के भीतर पूरा करने का प्रावधान किया गया है।
विशेष फास्ट ट्रैक अदालत के फैसले, सजा अथवा आदेश के विरुद्ध संबंधित हाईकोर्ट की दो न्यायाधीशों वाली पीठ में अपील की जा सकेगी। विधेयक के अनुसार अपील का निस्तारण भी यथासंभव तीन महीने के भीतर किया जाना चाहिए।
सरकार ने विधेयक को सार्वजनिक परीक्षाओं की विश्वसनीयता और निष्पक्षता मजबूत करने वाला कदम बताया है। हालांकि विधेयक को कानून बनने के लिए अभी राज्यसभा की मंजूरी और राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलना आवश्यक है।