Thursday, 16 July 2026

खुली जेल में सात फेरे लेंगे उम्रकैद की सजा काट रहे दो बंदी: हाईकोर्ट ने कहा—सहमति से विवाह अनुच्छेद 21 के तहत अधिकार


खुली जेल में सात फेरे लेंगे उम्रकैद की सजा काट रहे दो बंदी: हाईकोर्ट ने कहा—सहमति से विवाह अनुच्छेद 21 के तहत अधिकार

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जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट के एक विशेष आदेश के बाद जोधपुर के मंडोर स्थित ओपन एयर कैंप में आजीवन कारावास की सजा काट रहे दो बंदी विवाह कर सकेंगे। महिला बंदी अपने पति की हत्या के मामले में दोषसिद्ध है, जबकि पुरुष बंदी हत्या के एक अन्य मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा है।

हाईकोर्ट ने कहा कि दो बालिग व्यक्तियों का आपसी सहमति से विवाह करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है। दोषसिद्ध होने मात्र से किसी व्यक्ति को सहमति से विवाह करने के अधिकार से पूरी तरह वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी माना कि विवाह बंदियों के सुधार, पुनर्वास और समाज की मुख्यधारा में लौटने की प्रक्रिया को मजबूत कर सकता है।

मूलाराम की याचिका पर हाईकोर्ट का आदेश

जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस प्रवीर भटनागर की खंडपीठ ने नागौर निवासी मूलाराम की अस्थायी सजा निलंबन याचिका का निस्तारण करते हुए यह आदेश दिया।

मूलाराम 16 फरवरी 2017 से आजीवन कारावास की सजा काट रहा है और वर्तमान में मंडोर स्थित ओपन एयर कैंप में रह रहा है। उसकी ओर से अधिवक्ता कालूराम भाटी ने अदालत को बताया कि वह सीमा गड़से गुलाब से विवाह करना चाहता है।

सीमा भी अपने पति की हत्या के मामले में दोषसिद्ध है और वर्तमान में 40 दिन की पैरोल पर बताई गई है।

विवाह से पुनर्वास की प्रक्रिया मजबूत होने का तर्क

याचिका में कहा गया कि दोनों बालिग हैं और आपसी सहमति से विवाह करना चाहते हैं। विवाह से उनके सुधार और पुनर्वास की प्रक्रिया को बल मिलेगा तथा भविष्य में उन्हें सामान्य पारिवारिक जीवन जीने का अवसर मिल सकेगा।

याचिकाकर्ता की ओर से राजस्थान हाईकोर्ट के पूर्व निर्णयों का भी हवाला दिया गया, जिनमें बंदियों के वैवाहिक और संतानोत्पत्ति संबंधी अधिकारों को संविधान के अनुच्छेद 21 के दायरे में माना गया था।

सरकार ने विवाह की इच्छा की पुष्टि की

राज्य सरकार की ओर से अदालत में प्रस्तुत रिपोर्ट में दोनों बंदियों की विवाह करने की इच्छा और उनके बीच लिव-इन संबंध होने की पुष्टि की गई।

लोक अभियोजकों ने अदालत को बताया कि जेल नियमों के अंतर्गत ओपन एयर कैंप में विधिसम्मत विवाह कराने पर राज्य सरकार को कोई आपत्ति नहीं है। इसके बाद अदालत ने दोनों को निर्धारित शर्तों के अधीन विवाह करने की अनुमति प्रदान की।

‘विवाह समाज की आधारभूत संस्था’

खंडपीठ ने कहा कि विवाह समाज की आधारभूत संस्थाओं में से एक है। दोषसिद्ध बंदियों के मौलिक अधिकार पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाते। कानून और जेल नियमों के अधीन रहते हुए उन्हें गरिमा के साथ जीवन जीने तथा आपसी सहमति से विवाह करने का अधिकार प्राप्त है।

अदालत ने माना कि पारिवारिक संबंध बंदियों में जिम्मेदारी की भावना विकसित करने और उनके सामाजिक पुनर्वास में सकारात्मक भूमिका निभा सकते हैं।

समारोह में अधिकतम 21 परिजन हो सकेंगे शामिल

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि विवाह समारोह में दोनों पक्षों के परिवारों के अधिकतम 21 सदस्य शामिल हो सकेंगे। इस संख्या में विवाह संस्कार संपन्न कराने वाला पंडित भी शामिल रहेगा।

हालांकि, विशेष परिस्थितियों में अतिथियों की संख्या बढ़ाने का अंतिम निर्णय ओपन एयर कैंप प्रशासन कर सकेगा। सभी आगंतुकों को जेल प्रशासन की सुरक्षा और प्रवेश संबंधी शर्तों का पालन करना होगा।

विवाह की तारीख पहले बतानी होगी

अदालत ने निर्देश दिया कि विवाह की तारीख की सूचना ओपन एयर कैंप प्रशासन को पहले से देनी होगी। प्रशासन सुरक्षा, प्रवेश, समय और अन्य आवश्यक व्यवस्थाएं निर्धारित करेगा।

विवाह समारोह का पूरा खर्च मूलाराम स्वयं वहन करेगा। आयोजन कैंप परिसर में जेल नियमों और प्रशासन की शर्तों के अनुसार संपन्न होगा।

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