



जयपुर। राजस्थान विधानसभा के 75 वर्ष पूरे होने पर बुधवार को आयोजित अमृत महोत्सव पूर्व और वर्तमान जनप्रतिनिधियों के ऐतिहासिक समागम में बदल गया। विधानसभा परिसर में उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागडे, पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली सहित बड़ी संख्या में वरिष्ठ नेता शामिल हुए।
कार्यक्रम में 237 पूर्व विधायक और 163 वर्तमान विधायक उपस्थित रहे। दो राज्यपालों, दो पूर्व विधानसभा अध्यक्षों तथा अन्य वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों सहित करीब 410 नेताओं की मौजूदगी ने आयोजन को राजनीतिक और विधायी इतिहास का विशेष अवसर बना दिया।
वरिष्ठ पत्रकारों को रखा दूर
कार्यक्रम में विधानसभा के अमृत महोत्सव से वरिष्ठ पत्रकारों को दूर रखा गया। वर्षों से विधानसभा का कवरेज करने वाले वरिष्ठ पत्रकारों को विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने नहीं बुलाया।
अमृत महोत्सव के दौरान राजस्थान विधानसभा के 75 वर्षों में पारित 24 ऐतिहासिक कानूनों पर दो विशेष सत्र आयोजित किए गए। इन सत्रों में पूर्व और वर्तमान विधायकों ने कानूनों की पृष्ठभूमि, उनके प्रभाव और क्रियान्वयन से जुड़े अनुभव साझा किए।
चर्चा के दौरान कई बार सदन सामान्य विधानसभा सत्र की तरह नजर आया। वक्ताओं के विचारों पर सदस्यों ने मेजें थपथपाकर समर्थन जताया, वहीं कुछ विषयों पर तीखी प्रतिक्रियाएं और व्यवधान भी देखने को मिला।
समारोह का सबसे भावुक क्षण उस समय आया, जब वैर से पूर्व विधायक 101 वर्षीय पंडित रामकिशन और दांतारामगढ़ के पूर्व विधायक नारायण सिंह का सम्मान किया गया।
उपराष्ट्रपति सहित मंच पर मौजूद वरिष्ठ नेता स्वयं उनकी कुर्सी तक पहुंचे और सम्मान किया। इस दौरान सदन में उपस्थित सभी सदस्य खड़े हो गए और तालियां बजाकर दोनों वरिष्ठ नेताओं के सार्वजनिक एवं विधायी जीवन के योगदान का अभिनंदन किया।
छह या उससे अधिक बार विधानसभा चुनाव जीतने वाले वरिष्ठ नेताओं के सम्मान के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सुमित्रा सिंह, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष शांतिलाल चपलोत और कैलाश मेघवाल कार्यक्रम में उपस्थित नहीं रहे।
समारोह में अन्य वरिष्ठ एवं अनुभवी जनप्रतिनिधियों को राजस्थान की लोकतांत्रिक और विधायी यात्रा में योगदान के लिए सम्मानित किया गया।
पूर्व मंत्री राजेंद्र राठौड़ ने कोचिंग संस्थानों के नियंत्रण से संबंधित कानून पर चर्चा करते हुए कहा कि प्रदेश के बड़े शहरों में कोचिंग संस्थानों की संख्या तेजी से बढ़ी है।
उन्होंने कहा कि कोचिंग संस्थानों द्वारा संचालित कथित ‘गारंटेड बैच’ की व्यवस्था ने राजस्थान में पेपर लीक जैसी प्रवृत्तियों की मजबूत नींव तैयार की। उन्होंने कोचिंग संस्थानों के प्रभावी नियमन, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की आवश्यकता बताई।
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष दीपेंद्र सिंह शेखावत ने गिग वर्कर्स से संबंधित कानून पारित होने के समय का अनुभव साझा किया। उन्होंने कहा कि विधेयक पर बोलने के लिए नौ विधायकों ने अपने नाम दिए थे, लेकिन चर्चा का समय आने पर कोई उपस्थित नहीं हुआ।
उन्होंने टिप्पणी की कि उस समय करीब 95 प्रतिशत सदस्यों को ‘गिग’ शब्द का अर्थ तक स्पष्ट नहीं था। इसके माध्यम से उन्होंने विधायकों को विधेयकों का अध्ययन करके सदन में आने और कानून निर्माण में गंभीर भागीदारी निभाने का संदेश दिया।
राजस्थान लोकायुक्त एवं उप-लोकायुक्त अधिनियम, 1973 पर चर्चा करते हुए पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सी.पी. जोशी ने कहा कि इस कानून के माध्यम से जनता को यह भरोसा दिलाया गया था कि मंत्री, सचिव या अन्य लोकसेवक गलत कार्य करेंगे तो उनके विरुद्ध कार्रवाई की जा सकेगी।
उन्होंने कहा कि जवाबदेही लोकतांत्रिक शासन की मूल शर्त है और कानूनों का उद्देश्य केवल संस्थाओं का गठन करना नहीं, बल्कि जनता को प्रभावी और निष्पक्ष व्यवस्था उपलब्ध कराना होना चाहिए।
पूर्व विधायक राजपाल सिंह शेखावत ने कहा कि केवल विकास की बातें करने से वास्तविक विकास नहीं होता। इसके लिए संसाधनों, वित्तीय व्यवस्था और कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन पर ध्यान देना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि सदन में कानून बनाना महत्वपूर्ण है, लेकिन यदि उन्हें धरातल पर प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया जाए तो उनका उद्देश्य पूरा नहीं होता। जनप्रतिनिधियों को विकास के वादों के साथ आवश्यक धनराशि और व्यावहारिक क्रियान्वयन की स्थिति का भी आकलन करना चाहिए।
अमृत महोत्सव ने राजस्थान विधानसभा की 75 वर्षों की लोकतांत्रिक यात्रा, महत्वपूर्ण कानूनों और जनप्रतिनिधियों के योगदान को एक मंच पर प्रस्तुत किया। पूर्व और वर्तमान विधायकों की संयुक्त उपस्थिति ने संसदीय अनुभवों के आदान-प्रदान और नई पीढ़ी को विधायी परंपराओं से जोड़ने का अवसर प्रदान किया।
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने अध्ययन, सार्थक बहस, राजनीतिक मर्यादा, कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन और जनता के प्रति जवाबदेही को लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक बताया।