



जालोर। राजस्थान में पंचायती राज और स्थानीय निकाय चुनाव समय पर नहीं कराए जाने को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला है। जालोर में मीडिया से बातचीत करते हुए गहलोत ने कहा कि संविधान के दायरे में रहते हुए समय पर चुनाव कराना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन मौजूदा सरकार हार के डर से चुनावों से भाग रही है।
पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत ने कहा कि पंचायती राज और स्थानीय निकाय लोकतंत्र की बुनियादी इकाइयां हैं। यदि सरकार समय पर इन संस्थाओं के चुनाव नहीं कराती है, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था और संविधान की भावना के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि पूरे प्रदेशवासियों को एक स्वर में इस स्थिति की निंदा करनी चाहिए।
पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत ने आरोप लगाया कि जब कोई सरकार संविधान की मर्यादा को ही नहीं मानती, तो उसे सत्ता में बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं रह जाता। उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार नैतिक रूप से बर्खास्त करने लायक है। गहलोत ने यहां तक कहा कि कायदे से राज्यपाल को राष्ट्रपति के पास मौजूदा सरकार को तुरंत बर्खास्त करने की सिफारिश भेजनी चाहिए।
पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत ने कहा कि आज देश के हालात गंभीर हैं और “डबल इंजन” के नारे की आड़ में लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि चुनाव टालना केवल प्रशासनिक देरी नहीं है, बल्कि जनता को उसके प्रतिनिधि चुनने के अधिकार से वंचित करने जैसा है।
पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत ने अपने कार्यकाल का उदाहरण देते हुए कहा कि वर्ष 1998 में जब वे मुख्यमंत्री थे, उस समय कर्मचारियों की हड़ताल चल रही थी। उन्होंने कहा कि उस परिस्थिति में चुनाव कराना कठिन था और सरकार ने चुनाव कुछ समय टालने की कोशिश भी की थी। लेकिन हाईकोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया कि चुनाव हर हाल में करवाने होंगे।
पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत ने कहा कि उस समय उनकी सरकार ने न्यायपालिका के आदेश का सम्मान किया। कर्मचारियों की हड़ताल के बावजूद अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों के सहयोग से चुनाव संपन्न कराए गए। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने कठिन परिस्थितियों में भी चुनाव करवाए और जनता ने उन्हें चुनाव में समर्थन भी दिया।
पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत ने वर्तमान सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि आज की सरकार को डर है कि पंचायत और निकाय चुनावों में भाजपा को बड़ा नुकसान होगा। इसी डर के कारण हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद चुनाव नहीं कराए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि सरकार को यदि अपने कामकाज पर भरोसा है, तो उसे चुनावों से डरने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। लोकतंत्र में जनता के बीच जाकर जनादेश लेना ही सबसे बड़ा परीक्षण होता है। लेकिन सरकार चुनाव से बचने के रास्ते तलाश रही है।
राजस्थान में पंचायती राज और स्थानीय निकाय चुनाव लंबे समय से लंबित हैं। हाईकोर्ट की ओर से समयसीमा तय किए जाने के बावजूद आरक्षण, ओबीसी प्रतिनिधित्व आयोग की रिपोर्ट और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों के कारण चुनाव कार्यक्रम अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है।
गहलोत के इस बयान के बाद प्रदेश की राजनीति में पंचायत और निकाय चुनावों का मुद्दा और तेज हो गया है। कांग्रेस इस मुद्दे को लोकतंत्र और संविधान से जोड़कर सरकार पर हमलावर है, जबकि सरकार की ओर से चुनाव कराने की तैयारी और प्रक्रियात्मक कारणों का हवाला दिया जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंचायत और निकाय चुनावों में देरी आने वाले दिनों में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकती है। स्थानीय निकाय और पंचायत चुनाव सीधे गांव, कस्बों और शहरों की राजनीति से जुड़े होते हैं। ऐसे में चुनावों में देरी से न केवल प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित होती है, बल्कि स्थानीय स्तर पर राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल भी खड़ा होता है।
फिलहाल अशोक गहलोत के बयान ने सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ा दिया है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि राज्य सरकार चुनाव प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए क्या कदम उठाती है और हाईकोर्ट की समयसीमा के संदर्भ में सरकार का अगला रुख क्या रहता है।