



राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनावों के लिए ओबीसी आरक्षण के निर्धारण को लेकर गठित अन्य पिछड़ा वर्ग राजनीतिक प्रतिनिधित्व आयोग का काम अब तक निर्णायक स्थिति में नहीं पहुंच पाया है। आयोग के गठन को 13 माह से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन आरक्षण निर्धारण की प्रक्रिया सरकार और आयोग के बीच आंकड़ों तथा पत्राचार के स्तर पर अटकी हुई है। पिछले करीब पांच माह से आयोग और राज्य सरकार के बीच लगातार चिट्ठियों का आदान-प्रदान हो रहा है, लेकिन अब तक ओबीसी आरक्षण के आधार को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है। इस बीच राज्य सरकार आयोग पर करीब 40 लाख रुपए खर्च कर चुकी है, जिसमें से लगभग 25 लाख रुपए सेवानिवृत्ति के बाद नियुक्त अध्यक्ष और सचिव के वेतन-मानदेय के रूप में दिए गए हैं।
हालांकि पिछले तीन माह से बजट जारी नहीं होने के कारण आयोग में अध्यक्ष, सचिव सहित अन्य स्तर पर भुगतान भी अटका हुआ बताया जा रहा है। आयोग में अध्यक्ष और चार सदस्यों के साथ सात अधिकारी-कर्मचारी कार्यरत हैं। अध्यक्ष सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी हैं, जबकि सचिव राजस्थान प्रशासनिक सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। दोनों को पे-माइनस पेंशन के आधार पर नियुक्त किया गया है, वहीं आयोग के सदस्य 45 हजार रुपए प्रतिमाह के निश्चित मानदेय पर कार्य कर रहे हैं। अन्य कर्मचारी प्रतिनियुक्ति पर लगाए गए हैं।
आयोग का मुख्य उद्देश्य पंचायतों और निकायों में ओबीसी वर्ग के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के आधार का अध्ययन कर आरक्षण निर्धारण से जुड़ी रिपोर्ट तैयार करना है, लेकिन आवश्यक आंकड़ों और फील्ड सर्वे की प्रक्रिया पूरी नहीं होने से रिपोर्ट लंबित है।
वाहनों के बिल अटकने से भी आयोग के काम पर असर पड़ने की आशंका है। आयोग को वाहनों के लिए 12 लाख रुपए का बजट उपलब्ध कराया गया था। इसके बाद आयोग के अध्यक्ष और सदस्य नवंबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच संवाद और अन्य कार्यों के लिए विभिन्न स्थानों पर दौरे पर गए थे। अब इन दौरों से जुड़े वाहन बिलों का भुगतान अटका हुआ है। बताया जा रहा है कि मंत्रिमंडलीय समिति ने अभी इन बिलों को मंजूरी नहीं दी है। आयोग के सदस्य अब सर्वे कार्य के लिए दोबारा फील्ड विजिट की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन पुराने बिलों का भुगतान नहीं होने से वाहन उपलब्ध कराने में अड़चन आ सकती है। इसका सीधा असर सर्वे की गति और आयोग की रिपोर्ट पर पड़ सकता है। स्टेशनरी जैसी मूलभूत जरूरतों के लिए भी आयोग स्वायत्त शासन विभाग और पंचायती राज विभाग पर निर्भर है।
ओबीसी आरक्षण के निर्धारण में सबसे बड़ा पेंच आंकड़ों को लेकर फंसा हुआ है। आयोग ने पहले पिछले वर्ष ओबीसी वर्ग की स्थिति जानने के लिए सर्वे कराने की तैयारी की थी, लेकिन मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के कारण यह काम आगे नहीं बढ़ पाया। इसके बाद आयोग ने संवाद प्रक्रिया के आधार पर रिपोर्ट को अंतिम रूप देने के लिए राज्य सरकार से ओबीसी से जुड़े आंकड़े मांगे।
सरकार ने आयोग को जनाधार आधारित आंकड़े उपलब्ध कराए, लेकिन इन आंकड़ों में कुछ पंचायतों की जानकारी उपलब्ध नहीं थी। इसके बाद आयोग ने सरकार से ऐसी पंचायतों की डिटेल मांगी, लेकिन सरकार की ओर से स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं कराए जाने के बाद अब आयोग फिर से सर्वे कराने की तैयारी में है। ऐसे में पंचायत और निकाय चुनावों से पहले ओबीसी आरक्षण का निर्धारण कब तक पूरा होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है।