


राजसमंद। बदलते दौर में जहां आधुनिक जीवनशैली ने पारंपरिक जीवन मूल्यों को पीछे छोड़ दिया है, वहीं एक पुराने मिट्टी के चूल्हे ने वर्षों बाद अपनी मां की यादों से जुड़े भावनात्मक संसार को फिर जीवंत कर दिया। लेखक मधुप्रकाश लड्ढा ने अपने संस्मरणात्मक आलेख ‘चूल्हा : मां के स्पर्श का मर्म’ में 25 वर्षों बाद पैतृक घर लौटने पर अनुभव की गई भावनाओं को अत्यंत संवेदनशीलता से व्यक्त किया है।
लेखक बताते हैं कि वर्षों बाद जब उन्होंने पुराने घर की दहलीज पर कदम रखा तो बचपन की स्मृतियां चलचित्र की तरह आंखों के सामने तैरने लगीं। कभी माता-पिता की उपस्थिति, प्रेम और आत्मीयता से भरा रहने वाला घर अब केवल ईंट-पत्थरों का मकान बनकर रह गया था। मां की मखमली आवाज और पिता के स्नेहिल अनुशासन की अनुपस्थिति ने घर की आत्मा को जैसे मौन कर दिया हो।
आलेख का केंद्र बिंदु वह मिट्टी का चूल्हा है, जिसे वर्षों पहले उनकी मां ने अपने हाथों से बनाया और संभाला था। समय के लंबे अंतराल के बावजूद चूल्हा आज भी उसी स्थान पर सुरक्षित है। उसके साथ जुड़े चकला-बेलन, संडासी, जाली और अन्य घरेलू उपकरण भी मानो बीते समय की गवाही दे रहे हैं। लेखक के अनुसार, चूल्हे के बाहरी आवरण पर आज भी मां की उंगलियों के निशान मौजूद हैं, जिन्हें स्पर्श करते ही उन्हें मां के स्नेह और आलिंगन का अनुभव हुआ।
लेख में आधुनिक समाज और बदलते पारिवारिक रिश्तों पर भी गहरी टिप्पणी की गई है। लेखक लिखते हैं कि बेजान चूल्हा तो मौसमों की मार सहकर भी नहीं बदला, लेकिन इंसान बदल गए। कभी छोटे घरों में बड़े दिल बसते थे, आज बड़े घरों में रिश्तों की गर्माहट कम होती जा रही है। यह तुलना वर्तमान सामाजिक संरचना और पारिवारिक विघटन की ओर संकेत करती है।
भावनात्मक शैली में लिखे गए इस आलेख में मां को त्याग, समर्पण और प्रेम की प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेखक याद करते हैं कि कैसे मां ने तपती गर्मी और कठिन परिस्थितियों में स्वयं कष्ट सहकर परिवार की भूख मिटाई। उनके अनुसार वह चूल्हा अब सिर्फ रसोई का साधन नहीं, बल्कि मां के प्रेम, श्रम और त्याग की जीवित स्मृति बन चुका है।
आलेख का अंतिम हिस्सा समय के बदलाव और नई पीढ़ी की जीवनशैली पर केंद्रित है। लेखक मानते हैं कि आने वाले समय में नए चूल्हे तो बनेंगे, लेकिन उनमें मिट्टी की सोंधी खुशबू, मां की उंगलियों के निशान और भावनाओं की वह गर्माहट शायद नहीं होगी, जो कभी संयुक्त परिवारों और पारंपरिक जीवन में महसूस की जाती थी।
यह आलेख केवल एक संस्मरण नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक परिवेश, पारिवारिक मूल्यों और मां के अमिट प्रेम को समर्पित एक भावपूर्ण अभिव्यक्ति है, जो पाठकों को अपनी स्मृतियों और रिश्तों के महत्व पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती है।