



राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर खंडपीठ ने बुधवार को बहुचर्चित नाबालिग यौन उत्पीड़न मामले में फैसला सुनाते हुए आसाराम की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति अरुण मोंगा और न्यायमूर्ति योगेन्द्र कुमार पुरोहित की डिवीजन बेंच ने यह फैसला सुनाया। वहीं मामले में सह-आरोपी शिल्पी और शरतचंद को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया। अदालत ने 20 अप्रैल 2026 को फैसला सुरक्षित रख लिया था।
फैसले के समय आसाराम अंतरिम जमानत पर बाहर है, लेकिन हाईकोर्ट द्वारा सजा बरकरार रखे जाने के बाद अब उसे आत्मसमर्पण करना होगा। इस फैसले को लंबे समय से चल रहे मामले में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत में इस प्रकरण की लगातार कई सप्ताह तक सुनवाई चली थी, जिसमें बचाव पक्ष और अभियोजन पक्ष ने विस्तार से अपने-अपने तर्क रखे।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दावा किया कि पूरा मामला मनगढ़ंत है और पीड़िता के माता-पिता के बयानों में गंभीर विरोधाभास हैं। आसाराम के वकीलों ने अदालत में कहा कि कथित घटना की रात आसाराम और पीड़िता के बीच किसी प्रकार का कॉल रिकॉर्ड भी मौजूद नहीं है। बचाव पक्ष ने समानता के सिद्धांत का हवाला देते हुए तर्क दिया कि जब समान साक्ष्यों के आधार पर अन्य सह-आरोपियों को ट्रायल कोर्ट से राहत मिली, तो केवल आसाराम को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
वहीं अभियोजन पक्ष की ओर से पीड़िता के अधिवक्ता पी.सी. सोलंकी और सरकारी वकीलों ने अदालत में जोरदार पक्ष रखा। अभियोजन ने कहा कि पॉक्सो कानून के मामलों में पीड़िता का एकल बयान भी सजा के लिए पर्याप्त माना जाता है और इस सिद्धांत को सर्वोच्च न्यायालय पहले ही मान्यता दे चुका है। अभियोजन पक्ष ने यह भी दलील दी कि मामले से जुड़े गवाहों पर हमले और कई संदिग्ध घटनाएं इस बात की ओर संकेत करती हैं कि साक्ष्य मिटाने की कोशिश की गई, जो आरोपियों की भूमिका को और मजबूत करती है।
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद एक बार फिर यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया है। फैसले को पॉक्सो कानून और यौन अपराध मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है।