



नई दिल्ली। अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध के चलते वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी के बीच केंद्र सरकार विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहे दबाव को लेकर गंभीर मंथन कर रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सरकार पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी समेत कई आपात कदमों पर विचार कर रही है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार ईंधन कीमतों में संशोधन कर विदेशी मुद्रा भंडार की सुरक्षा और आयात लागत को नियंत्रित करने की रणनीति पर काम कर रही है। वहीं टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ती तेल कीमतों के असर को सीमित करने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO), वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच चर्चा हुई है। हालांकि अभी तक किसी प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।
सूत्रों के अनुसार पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं, जिससे भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, जिसके कारण तेल की कीमतों में वृद्धि सीधे विदेशी मुद्रा भंडार और चालू खाते पर असर डालती है।
इसी बीच सोमवार को राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में वेस्ट एशिया मामलों पर मंत्रियों के अनौपचारिक समूह (IGoM) की पांचवीं बैठक आयोजित की गई। बैठक में स्थिति की समीक्षा करते हुए बताया गया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने के बावजूद तेल कंपनियां आम उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ न पड़े, इसके लिए प्रतिदिन लगभग ₹1000 करोड़ का नुकसान उठा रही हैं।
सरकार फिलहाल संतुलन बनाने की कोशिश में जुटी है ताकि एक ओर महंगाई पर नियंत्रण बना रहे और दूसरी ओर विदेशी मुद्रा भंडार तथा तेल आयात लागत का दबाव भी संभाला जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबा खिंचता है तो आने वाले समय में ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।