



राजस्थान सरकार ने मरुस्थलीय क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण और पारंपरिक आस्था स्थलों के संरक्षण को ध्यान में रखते हुए जैसलमेर जिले में ओरण भूमि के आरक्षण की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। राज्य सरकार द्वारा जिले के विभिन्न गांवों में कुल 3666.2139 हेक्टेयर भूमि को ओरण क्षेत्र के रूप में आरक्षित किया गया है। इस पहल का उद्देश्य क्षेत्र के पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखना और जैव विविधता को संरक्षण देना है।
ओरण प्राचीन भारतीय परंपरा का हिस्सा है, जहां सामाजिक और धार्मिक मान्यताओं के कारण स्थानीय लोग इन क्षेत्रों को पवित्र मानकर संरक्षण देते हैं। मान्यता के अनुसार इन स्थानों पर पेड़ों की कटाई और कुल्हाड़ी का उपयोग वर्जित होता है, जिससे प्राकृतिक रूप से पर्यावरण सुरक्षित रहता है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार रामगढ़ तहसील के दिलावर का गांव, कुछड़ी और पूनमनगर सहित फतेहगढ़ तहसील के भीमसर और बींजोता जैसे गांवों में बड़ी मात्रा में भूमि को ओरण के रूप में चिन्हित किया गया है। इसके अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी आरक्षण की प्रक्रिया जारी है, जिससे भविष्य में यह दायरा और बढ़ सकता है। ‘ओरण’ शब्द संस्कृत के ‘अरण्य’ से निकला है, जिसका अर्थ बिना छेड़ा गया जंगल होता है। यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि मरुस्थलीकरण को रोकने और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
वहीं दूसरी ओर, ओरण भूमि संरक्षण को लेकर जयपुर में जनआंदोलन भी तेज हो गया है। सीकर रोड स्थित भवानी निकेतन से “ओरण बचाओ” पदयात्रा निकाली गई, जिसमें जैसलमेर समेत कई जिलों से सैकड़ों लोग शामिल हुए। पदयात्रा का उद्देश्य मुख्यमंत्री आवास तक पहुंचकर सरकार का ध्यान इस मुद्दे की ओर आकर्षित करना था।
हालांकि पुलिस ने पदयात्रा को बीच रास्ते में ही रोक दिया, जिससे मौके पर तनाव की स्थिति बन गई और हल्की झड़प भी हुई। इस आंदोलन में शामिल निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने सरकार पर निशाना साधते हुए ओरण भूमि की सुरक्षा को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया दी। यह पूरा घटनाक्रम एक ओर जहां सरकार की पर्यावरण संरक्षण नीति को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर इस विषय को लेकर जनता की संवेदनशीलता और सक्रियता को भी उजागर करता है।