Wednesday, 15 April 2026

बीकानेर की बदहाल व्यवस्था पर मनोहर चावला ने “मैं चुप्प रहूँगी ! हम भी चुप्प रहेंगे” के माध्यम से समाज की बढ़ती उदासीनता और मौन संस्कृति पर उठाए गंभीर सवाल


बीकानेर की बदहाल व्यवस्था पर मनोहर चावला ने “मैं चुप्प रहूँगी ! हम भी चुप्प रहेंगे” के माध्यम से समाज की बढ़ती उदासीनता और मौन संस्कृति पर उठाए गंभीर सवाल

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राजस्थान के बीकानेर शहर की बदहाल नागरिक सुविधाओं और प्रशासनिक लापरवाही को लेकर वरिष्ठ पत्रकार एवं जनसंपर्क विभाग से सेवानिवृत्त संयुक्त निदेशक मनोहर चावला ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने अपनी टिप्पणी “मैं चुप्प रहूँगी! हम भी चुप्प रहेंगे” के माध्यम से समाज की बढ़ती उदासीनता और मौन संस्कृति पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

मनोहर चावला ने कहा कि शहर में लंबे समय से बुनियादी सुविधाओं की हालत बेहद खराब है, लेकिन इसके बावजूद नागरिक आवाज़ उठाने से बच रहे हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि कई क्षेत्रों में कचरा संग्रहण नियमित नहीं हो रहा, गलियां गंदगी से भरी हैं, स्ट्रीट लाइटें बंद रहती हैं और आवारा कुत्तों का आतंक बढ़ता जा रहा है। इसके अलावा सड़कों की जर्जर स्थिति, गहरे गड्ढे और रेलवे फाटकों की समस्याएं आम जनजीवन को प्रभावित कर रही हैं, लेकिन इन मुद्दों पर कोई संगठित विरोध देखने को नहीं मिलता।

उन्होंने शहर में बढ़ते अतिक्रमण और अवैध निर्माण पर भी चिंता जताई। पवनपुरी और जय नारायण व्यास कॉलोनी जैसे इलाकों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि आवासीय क्षेत्रों में बिना अनुमति व्यावसायिक गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं। होटल, रेस्टोरेंट, कोचिंग सेंटर, लैब और अन्य प्रतिष्ठान नियमों को ताक पर रखकर संचालित हो रहे हैं, जिससे स्थानीय निवासियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

मनोहर चावला ने भ्रष्टाचार और प्रशासनिक तंत्र पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि कई विभागों में सिफारिश और रिश्वत के आधार पर कार्य हो रहे हैं, जिससे आम नागरिक का भरोसा कमजोर हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि स्वास्थ्य और परिवहन जैसे क्षेत्रों में भी अनियमितताएं बढ़ रही हैं, जहां मरीजों और यात्रियों से अनुचित लाभ लिया जा रहा है।

उन्होंने नागरिकों की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि जब लोग स्वयं ट्रैफिक नियमों का पालन नहीं करते, बिना हेलमेट वाहन चलाते हैं और नियमों की अनदेखी करते हैं, तो व्यवस्था सुधारने की उम्मीद भी कमजोर हो जाती है। उनके अनुसार, समाज में बढ़ती हताशा और “कुछ नहीं बदल सकता” जैसी मानसिकता लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संकेत है।

मनोहर चावला ने अंत में कहा कि यदि नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक नहीं होंगे, तो न तो भ्रष्टाचार पर अंकुश लग पाएगा और न ही शहर का समुचित विकास संभव होगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले चुनावों में लोग जागरूक होकर ईमानदार प्रतिनिधियों का चयन करेंगे, जिससे व्यवस्था में सुधार की संभावना बन सके।

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