Thursday, 16 April 2026

पंचायत और निकाय चुनाव टालने को लेकर संवैधानिक ब्रेकडाउन का आरोप और राष्ट्रपति-राज्यपाल से हस्तक्षेप की मांग: अशोक गहलोत


पंचायत और निकाय चुनाव टालने को लेकर संवैधानिक ब्रेकडाउन का आरोप और राष्ट्रपति-राज्यपाल से हस्तक्षेप की मांग: अशोक गहलोत

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बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती के अवसर पर राजस्थान की राजनीति में संवैधानिक अधिकारों को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मंगलवार को मीडिया से बातचीत करते हुए राज्य की भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने स्थानीय निकायों और पंचायत चुनावों में हो रही देरी को ‘लोकतंत्र की हत्या’ बताते हुए सरकार की नीयत पर सवाल उठाए।

गहलोत ने इस मुद्दे को और गंभीर बनाते हुए देश के संवैधानिक पदों तक हस्तक्षेप की मांग की। उन्होंने कहा कि जब राज्य सरकार अदालतों के स्पष्ट निर्देशों की अनदेखी कर रही है, तब राष्ट्रपति और राज्यपाल का कर्तव्य बनता है कि वे हस्तक्षेप करें और लोकतंत्र की मूल इकाइयों—पंचायतों और नगर निकायों—की रक्षा करें। राजस्थान की राजनीति में यह एक असामान्य स्थिति मानी जा रही है, जब किसी पूर्व मुख्यमंत्री ने इस स्तर पर दखल की मांग की हो।

उन्होंने पंचायत, नगर निकाय और सहकारी संस्थाओं के चुनावों में हो रही देरी को लेकर गहरी चिंता जताई। गहलोत ने आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट और राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए स्पष्ट निर्देशों और तय समयसीमा के बावजूद सरकार चुनाव कराने से बच रही है। उन्होंने कहा कि पिछले कई वर्षों से सहकारी संस्थाओं के चुनाव नहीं हुए हैं और अब स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं को भी कमजोर किया जा रहा है।

कड़े शब्दों में सरकार की आलोचना करते हुए गहलोत ने इसे ‘संवैधानिक ब्रेकडाउन’ करार दिया। उन्होंने कहा कि जब सरकार संवैधानिक संस्थाओं के प्रति जवाबदेह नहीं रहती, तो उसे सत्ता में बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार केवल प्रतीकात्मक राजनीति कर रही है और अंबेडकर जयंती जैसे आयोजनों के जरिए दिखावा कर रही है, जबकि व्यवहार में संविधान के मूल्यों की अनदेखी हो रही है।

गहलोत ने कहा कि जिन लोगों को आज सत्ता मिली है, उनका अंबेडकर के सिद्धांतों में वास्तविक विश्वास नहीं है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि यदि सरकार को संविधान पर विश्वास होता, तो पंचायतों और नगरपालिकाओं में जनता के चुने हुए प्रतिनिधि होते, न कि प्रशासकों का नियंत्रण। इसके साथ ही उन्होंने देश में न्यायपालिका और केंद्रीय एजेंसियों की स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि वर्तमान समय में ये संस्थाएं स्वतंत्र रूप से कार्य करने के बजाय दबाव में दिखाई दे रही हैं, जिससे लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हो रही हैं। कुल मिलाकर, अंबेडकर जयंती के अवसर पर दिया गया यह बयान राजस्थान की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे रहा है, जिसमें संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं और चुनावी प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

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