Tuesday, 07 April 2026

सबरीमाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई तेज: महिलाओं की एंट्री पर केंद्र ने रखा पक्ष, न्यायमूर्ति नागरत्ना की टिप्पणी मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं को ‘अछूत’ मानना समझ से परे


सबरीमाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई तेज: महिलाओं की एंट्री पर केंद्र ने रखा पक्ष, न्यायमूर्ति नागरत्ना की टिप्पणी मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं को ‘अछूत’ मानना समझ से परे

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे पर अहम सुनवाई शुरू कर दी है। मंगलवार को पहले दिन करीब 5 घंटे तक चली बहस में केंद्र सरकार ने स्पष्ट रूप से मासिक धर्म आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक का समर्थन किया। सरकार ने कहा कि वर्ष 2018 में सभी वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश देने का फैसला गलत था और यह मामला पूरी तरह धार्मिक आस्था व संप्रदाय के अधिकारों से जुड़ा हुआ है, जिसमें अदालतों को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

सुनवाई के दौरान केंद्र ने दलील दी कि धार्मिक प्रथाओं को केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता या समानता के आधार पर नहीं परखा जा सकता। सरकार ने कहा कि हर धार्मिक समुदाय की अपनी मान्यताएं और परंपराएं होती हैं, जिनका सम्मान किया जाना चाहिए। उदाहरण देते हुए कहा गया कि यदि किसी धार्मिक स्थल पर सिर ढकना अनिवार्य है, तो इसे अधिकारों के हनन के रूप में नहीं देखा जा सकता। केंद्र का तर्क था कि अदालत को यह तय करने से बचना चाहिए कि कोई धार्मिक प्रथा वैज्ञानिक है या नहीं, क्योंकि इससे न्यायपालिका अपने विचार धर्म पर थोपने लगेगी।

इस दौरान न्यायमूर्ति नागरत्ना ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं को ‘अछूत’ मानना समझ से परे है। उन्होंने कहा कि यह स्वीकार्य नहीं हो सकता कि महीने के कुछ दिनों में महिला को अछूत माना जाए और फिर अचानक वह स्थिति समाप्त हो जाए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई प्रथा सामाजिक बुराई है, तो अदालत यह तय कर सकती है कि वह वास्तव में धार्मिक प्रथा है या नहीं।

केंद्र सरकार ने इसके जवाब में कहा कि यदि कोई प्रथा गैर-वैज्ञानिक या विवादित लगती है, तो उसका समाधान संसद या विधानसभा के माध्यम से होना चाहिए, न कि न्यायालय के जरिए। साथ ही यह भी कहा गया कि केवल वही प्रथाएं तत्काल रोकी जा सकती हैं जो सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ हों।

गौरतलब है कि इस मामले से जुड़ी 50 से अधिक रिव्यू याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं, जिन पर 22 अप्रैल तक सुनवाई जारी रहेगी। इस दौरान न केवल सबरीमाला मंदिर, बल्कि मस्जिदों में महिलाओं की एंट्री, दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना और पारसी महिलाओं के धार्मिक अधिकार जैसे व्यापक मुद्दों पर भी विचार किया जाएगा।

यह मामला देश में धार्मिक स्वतंत्रता, लैंगिक समानता और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन तय करने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आने वाला फैसला कई धार्मिक प्रथाओं और सामाजिक मान्यताओं पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।

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